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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 690 में से

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पृष्ठ 258

भक्तिपदार्थवर्णन । २२१
निरगुन स्तुति अधिक जू सरगुन में कही ।
मेरे मन में समझि न आवत कछु यही ॥
बोले गुरु शुकदेव ये सुन के बात कूं ।
राजा मनचितलाय सुनों या काथ कूं ॥
हरि इच्छा सों जबहि उन्ह शिक्षा भई ।
तब अधिकारी होय स्तुति वेदन कही ॥
दो० नारायण पै जाय के, नारद चरणहि दास ।
यही बात पूछत भए, कर कर उमंग हुलास ॥
अष्टपदीछन्द ॥
हरि भक्तन के मांहि महा मुनि अति गुनी ।
एक दिवस कर चाव श्री नारद मुनी ॥
श्री नारायण पास जु वह चल कर गयो ।
दरशन उनके पाय मुदित मन में भयो ॥
नमस्कार कर जोर ऋषी ज्ञानी महा ।
नारायन सों बोल बचन ऐसे कहा ॥
स्तुति श्रीभगवान की वेदन गाई है ।
सो सब हम को आज कही समझाईए ॥
श्रीनारायण बोल वचन मुखते कहै ।
नारदसों यहि भांति वचन भाखत भये ॥
एक दिवस सनकादि ऋषी शिरमौरही ।
सुत ब्रह्मा के जान न उन सम औरही ॥
बैठ सभा के मांहि देवही लोक में ।
राजत जैसे चंद तारन संयोग में ॥
तहां चली यह बात सकल मन भांवती ।
वेदन स्तुति कही किहिं भांति सुहावती ॥