भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
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२२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चारों भैया जान सनक कूं आदि दे ।
परम पुनीत प्रवीन सकल गुन आगरे ॥
भगवत कथा सब कोऊ सुने चित लायके ।
जो पे ज्ञानी होंहिं ज्ञान को पाय के ॥
तिहि कारनही बैठ सकल आता तहां ।
बोले अति परबीन सनक इहि बिधि जहां ॥
वेदन ऐसीं भांत सूं यह स्तुति करी ।
जै जै जै तुम आदि पुरुष नित हो हरी ॥
त्यागो निद्रा जोग जागो करतार जू ।
निज माया बिस्तार सृजो संसार हू ॥
जो पै माया रहत तुम्हारे संगही ।
तुम कबहु करतार जु वाके बस नहीं ॥
खोटी अधम जो नारि कहीं कोई होत है ।
अपने पति को दोष लगावत है वहै ॥
यह कारन मन लाय के माया परिहरो ।
जग सिरजन के काज आप आज्ञा करो ॥
तुम तिरबिधि भगवान रहत ब्रह्माण्ड में ।
प्रथम सूक्ष्म प्रान रहत है पिण्ड में ॥
दुतिय रूप