भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ चीर हरण लीला ॥
( पद ) पैयां लागूं मोहन प्यारे दीजे म्हारो चीर, जाड़ो
लागै छैजी म्हांने जमुना के तीर । कहां सीखे ऐसी टेव अहो
बलवीर, हम अबला ठाढ़ी नगन शरीर ॥ कदम के ऊपर बैठे
बसन चुराय, माखन लै लै खाते हम सों सौ सौ हाहा खाय ।
विनती करते अति शीश नवाय, रखिये अब लाज हमारी
हूजिये सहाय ॥ तब बोले अंतरयामी अंतर उधार, लै लै
जावो वस्त्र अपने एहो ब्रजकी नार । प्रेम की भक्ति करी तुम
सुकुमार, प्रेम के आधीन फिरों भक्तन के लार ॥ अपनो भायो
कियो प्यारे श्याम सुजान, वस्त्र देदीने सखी छाड़ी कुलकी
कान । तन मन माहीं रमें कृष्ण भगवान, प्रीति की परीक्षा
करी नंद जू के कान ॥ यशोदा को छैया श्याम भैया बलदेव,
मानलई सत्य प्रीति सखियन की सेवा । हरि की लीला कही
शुक मुनि देव, चरनदास सखि पायो निज भेव ॥
अथ श्रीशुक मुनिराज अष्टक प्रारम्यते
पोडशवर्ष किशोर मूरति श्याम वरण दिगम्बरम् ।
घूँघरवाले केश झलके शुकमुनि चरण प्रणमहं ॥
पद्म आसन उद्र त्रिवलीं चरण पंकज शोभितं ।
आजानु भुज मुसकात मुखसों शुकमुनि चरणप्रणमहं ॥
गूढ़ यंत्र विशाल उर छबि नाभि गंभीर राजितं ।
जलजलोचन सुखदनासा, शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
व्यासनंदन भक्तवंदन मोह ममत्व निकंदनं ।
काम क्रोध मद लोभ न जिन में शुकमुनि चरणप्रणामहं ॥
ब्रह्मरूप अनूप मुनिबर पराशर कुल भूषणं ।
कृष्ण चरित पुनीत वरणत शुकमुनि चरणं प्रणामहं ॥