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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

भक्तिपदार्थवर्णन । २३१
बेद स्तुति भलि भांति सो लैकर चित धरी ॥
श्री नारायण बचन कहै इस रीति सों ।
नारद श्रोता भये अधिकहीं प्रीति सों ॥
श्री नारद वह कथा सकल मनभावती ।
वेदव्यास सूं कही जु अधिक सुहावती ॥
जैसी विधि जेहि भांति जो तिन सों हम सुनी ।
वाही विधि वाही रीति सों तुम आगे भनी ॥
ऐसे कहि शुकदेव परिक्षित राजसों ।
भाषा कर मैं कही मुक्ति के काज कों ॥
सब मिलि सुनियो संत बिबेक विचारियो ।
भक्ति हिये में राख आन सब डारियो ॥
भक्ति किये बस होय जक्त करतारही ।
ब्राह्मण शुद्ररु पुरुष करो कै नारही ॥
साधु सती अरु सूर बहुत दाता भये ।
इन की नाहीं जात चरनदासा कहै ॥
यह स्तुति जो कहै सुनै चित लायकै ।
सतसंगति लहै बास जो अघहि नसायकै ॥
समझ धरै मन मांहिं मुक्ति सोई पावई ।
भवसागर दुखरूप जहां नहीं आवई ॥
दो० वेद स्तुति पूरी करी, भेद दिया गुरुदेव ।
चरनदास के शीश पै, सदा रहो शुकदेव ॥
इति श्री भाषावेदस्तुति ॥
श्रीमदाचार्य्यवर्य्य श्यामाचरणदासजी रचित संपूर्णम् शुभम् ।
श्रीराधाकृष्णार्पणमस्तु ॥
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