भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ज्यों की त्यों सूझी नहीं, किया मोह ने अंध ॥
सब ठग यह देखी नहीं, कपट हेत नहिं जान ।
इनही में मिलकर चलौ, समझौ ना अज्ञान ॥
अब इनके छल कहत हूँ, समझै होय उदास ।
जानै ना द्वाई रहे, कहै चरणही दास ॥
अब इनके छल कहि समझाऊं । भिन्न भिन्न परगट दिखलाऊं ॥
पिता कहै तुम पुत्र हमारे । बहुत भरोसे मोहिं तुम्हारे ॥
अब तुम ऐसी बिद्या पढ़ो । अपने कुल में ऊंचे चढ़ो ॥
सतसंगति में कभी न जइये । अपने घर में चित्त लगइये ॥
हम तो हैं दुनियां के क्रूते । जाति वरण में होहिं सपूते ॥
कृत्य करो पालौ सुत वाम । कथा कीरतन सूं क्या काम ॥
अब तुम ठौर हमारी हूजै । हमने किये सो तुमहूँ कीजै ॥
ऐसी बुद्धि बड़ाई दीन्ही । इनहू हिरदय में धरि लीन्ही ॥
चरणदास कहैं देखो प्यार । मुये नरक जीवितहौ ख्वार ॥
दो० पिता बुद्धि ऐसी दई, रहिये कुटुंब मंझारि ।
जो कुछ है सो जक्तमें, धन सम्पति सुत नारि ॥
हरिकी राह भुलाय करि, दोन्हो कुटुंब चिताय ।
ताते दुख जगमें घने, चौरासी भरमाय ॥
अब सुन माताहू की वातैं । अपना जान खियावै तातैं ॥
द्रव्यकाज उद्यमहीं कीजै । ला माता की गोदी दीजै ॥
करै कमाई सोई सपूता । नाहीं तौ वह पूत कपूता ॥
नारी कूं भूषण पहिनावो । सुत पुत्री को ब्याह रचावो ॥
पूजौ पित्तर देवी देवा । सकल कुटुंब की कीजै सेवा ॥
अपने कुलकोन्योति जिमावो । ताते बहुत बड़ाई पावो ॥