भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 262, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदा २२७
तुम्हरो रूप अरूप
जहाँ कर्म मन वचन
हम हूँ जो पै वेद
तो पै तुम्हरो भेव कह
तुम्हरो रूप अरूप न
पंथ तुम्हारे की देह बताय
ज्ञान भक्ति बैराग्य जु न उपजें ।
तब तुम्हरी पहिचान हिये में नीपजै ॥
दस इन्द्रिन कूँ रोक जु मन के बस करै ।
सो मन अपनी बुद्धि मांझही ले धरै ॥
जब वह अपनी बुद्धि तुम्हीं सो लावई ।
सोई जोगी होय वे साधु कहावई ॥
जो पै नाम प्रकाश तें बहु विधि संचरै ।
भक्ति बिना निर्वान को पद नाहीं लहै ॥
जो पै काल पर्यन्त जो जीवे नर कोई ।
तो भी होवे नाश ब्रह्मा के संगवही ॥
जौपै देवन मांहिं जाय के अवतरै ।
तो भी न छूटैं कर्म मुक्ति घर ना करैं ॥
बेडी लोहे की होहि सोने की जानिये ।
दौंऊ एक समान उहि विधि मानिये ॥
तुम्हरो पुरुष स्वरूप प्रगट जब होय जू ।
ब्रह्मादिक सब देव पूजत में सोय जू ॥
कर कर यज्ञ उपाय जगत के लोय हैं ।
देवन पूजा साज करत सब कोय हैं ॥
स्वर्ग लोक में जाय ताको फल पावई ।
मृत्यु लोकही मांहिं बहुरि फिर आवई ॥