भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
भक्तिपदार्थवर्णन । १६६
अरु भूप करै अभिमाना। उन आपैही कूं जाना॥
उन काल नहीं पहिंचाना। सो मार करै घमसाना॥
गुरु (शुकदेव चितावै। तोहिं परगट नैन दिखावै॥
यम वांधि पकरि, लेजावैं। वै बहुतै त्रास१ दिखावैं॥
जब कहां जाय अभिमाना। मेरा नीका सुन यह ताना॥
फिर डारै नरक मँझारी। सुनि चेतौ नर अरु नारी॥
तौ मद मत्सरता२ तजि दीजै। साधों के चरण गहीजै॥
हरि भक्ति करौ चितलाई। जब सकल व्याधि छुटिजाई॥
कर जाति वरणकुल दूरा। हो सतसंगति में पूरा॥
जब मुक्तधामकूं पावै। फिर गर्भ योनि नहिं आवै॥
कहैं गुरु शुकदेव बखानौ। यह चरणदास मन आनौ॥
दो० मनमें लाय विचारकूं, दीजै गर्व निकार।
नान्हापन जब आय है, छुटै सकल विकार॥
पांचौ उतरै भूत जब, ह्वैहौ ब्रह्म अरूप।
आनँद पद कूं पायहौ, जितहै मुक्तस्वरूप॥
पांच-प्रेत जो ये कहे, सतगुरुके परताप।
शील अंग अब कहतहूँ, जासूं छूटै पाप॥
अथ शीलअंग वर्णन ॥
दो० अब मैं गाऊँ शीलकूं, येहो सन्त सुजान।
नर नारी सबही सुनौ, दै दै चित बुधिकान॥
रूपगुणी कुलवंत जो, अरु होवै धनवन्त।
शील बिना शोभा नहीं, भिष्टै नरक पड़न्त॥
शील विना जो तप करै, करै शील बिन दान।
योग युक्तिकरै शील विन, सो कहिये अज्ञान॥
१ डर २ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य ॥
१५
२०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शील बड़ोही योगहै, जो कर जानै कोय ।
शीलविहीनो चरणदास, कवहूँ मुक्ति नहिं होय ॥
सब गुण लक्षणतो विषे, शील न आया एक ।
जपतप निष्फल जाहिंगे, चरणहिं दास विवेक ॥
पूजा संयम नेम जो, यज्ञ करै चितलाय ।
चरणदास कहैं शील बिन, सबी अकारथ जाय ॥
सोइ सती सोइ शूरमा, सोइ दाता अधिकाय ।
शील लिये नितही रहै, तौनिष्फल नहिंजाय ॥
शील अंग ऊंचो अधिक, उन तीसों के बीच ।
जाघट¹ शील न आइया, सो घट कहिये नीच ॥
शील न उपजै खेत में, शीलन हाट बिकाय ।
जो हो पूरा टेक का, लेवै अँग उपजाय ॥
शील बिना नरकै परै, शील बिना यम दण्ड ।
शील बिना भरमत फिरै, सात द्वीप नौ खण्ड ॥
शील बिना भटकत फिरै, चौरासी के माहिं ।
पहिले होवै प्रेत ही, यामें संशय नाहिं ॥
सब तजि सेवो शील कूं, राम नाम लौलाय ।
जीवत शोभा जगत में, मुये मुक्ति है जाय ॥
जाको शील सुभाव है, ताकी दूर बलाय ।
ताकी कीरंति² जगत में, सुनहो कान लगाय ॥
शील रहते सब रहें, जेते हैं शुभ अंग ।
ज्यों राजा के रहते, रहै फौज को संग ॥
सत्यगया तौ क्या रहा, शील गया सब झाड़ ।
भक्त खेत कैसे बचै, टूट गई जब बाड़ ॥
१ शरीर २ यश ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २०१
ज्वानी शील न राखिया, बिगड़ गई सब देह।
अब पछितावा क्या करै, मुख पर उड़िया खेह¹ ॥
शील गये शोभा घटै, या दुनिया के माहिं ।
कूकरज्यों झिड़क्यों फिरै, कहीं भी आदर नाहिं ॥
शील गये गुरू सूं फिरै, हरि सों बेमुख होय ।
चरणदास कहाँ लौं कहैं, सर्वस डारै खोय ॥
धिक जीवन संसार में, ताको शील नशाय ।
जग में फिट फिट होत है, मुये ताचना पाय ॥
शील कसैला आँवला, और बड़ों के बोल ।
पाछे देवै स्वाद वै, चरणदास कहि खोल ॥
शील निरोगी नींबसा, औगुण डारै खोय ।
पहिले करुवा दुख लगै, पाछे गुण सुख होय ॥
लाख यही उपदेश है, एक शील कूं राख ।
जन्म सुधारौ हरि मिलौ, चरणदास की साख ॥
शीलवंत के चरण का, जो चरणोदक² लेय ।
रोग दोष मिटि जायँ सब, रहै न यमका भेय ॥
आठ अंग सूं शीलही, जाघट माहीं होय ।
चरणदास यों कहत हैं, दुर्लभ दर्शन सोय ॥
शीलवंत दर्शन बड़े, देखत पातक जाय ।
वचन सुनै मन शुद्ध हों, खोटी दृष्टि³ सिराय ॥
शील सरोवर न्हाय करि, करौ राम की सेव ।
यासम तीरथ और ना, कहिया गुरु शुकदेव ॥
शील अंग पूरो कियो, महिमा अधिक अपार ।
दया अंग वरणन करूं, समझै छुटै विकार ॥
१ धूरि २ पावोंका धोया हुआ जल ३ बुरी नज़र ॥
२०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ दयाअंग वर्णन ॥
दो० परमारथ में दया बड़, जो घट उपजै आय ।
परगट हो निर्वैरता¹, कर्म गांठि खुल जाय ॥
थावर जंगम चर अचर, या जग में हो कोय ।
सबही पै हित राखिये, सुखदानीही होय ॥
भोजन करौ सँभाल करि, पानी पीजौ छान ।
हरा वृक्ष नहिं तोड़िये, कर्म बचै यों जान ॥
औरौ बहुत विचारले, जामें लगै न कर्म ।
यही तपस्या जानिये, यही दया यहि धर्म ॥
इक इन्द्री दो इन्द्रियां, ती इन्द्री अरु चार ।
पंच इन्द्री लौं जीवकी, हिंसा अकस निवार ॥
खावै वस्तु विचारि कै, बैठै ठौर विचार ।
जो कुछकरै विचारकरि, किरिया यही अचार ॥
मन सों रहु निर्वैरता, मुख सूं मीठा बोल ।
तन सूं रक्षा जीव की, चरणदास कहि खोल ॥
करुवा वचन न बोलिये, तन सूं कष्टन देहु ।
अपनासा जी जानिकै, बनै तौ दुख हरिलेहु ॥
मुख सूं जो करुवा कहै, तन सूं देवै कष्ट ।
यही जु हिंसा जानिये, दया धर्मजा नष्ट ॥
दश इन्द्री मन ग्यारहवां, करि विचारि ले जान ।
इनहीं सूं सुख दीजिये, चरणदास पहिचान ॥
काहू दुख नहिं दीजिये, दुर्जन हो कै मीत ।
सुखदायी सब जगतको, गहो दया की रीत ॥
कोमलता परपीरता, सज्जनता निर्दोष ।
१ किसी से लड़ाई न मानना ॥
सबही दया के अंग हैं, इन ते पावै मोष ॥
दया ज्ञान का मूल है, दया भक्ति का जीव ।
चरणदास यों कहत हैं, दया मिलावै पीव ॥
दया नहीं तौ कुछ नहीं, सबही थोथी बात ।
बाहर कथनी सोहनी, भीतर लागी घात ॥
छापे तिलक बनायकै, माला पहिरी दोय ।
दया बिना बक¹सम अहो, साधुरूप नहिं होय ॥
दया न आई घट बिषे, हीया बड़ा कठोर ।
यह नगरी कैसे बसै, तामें हिंसा² चोर ॥
पँडिताई बहुतै करी, दया न राखी जीव ।
छाँछि³ छाँछि तैं लैलई, डारि दिया तत घीव ॥
तोहिं पण्डित मैं कइ कहूं, मूरख कै परवीन ।
लिया न तैं मत सूपका, चलनीका मतलीन ॥
दया गहेते सब नशें, पाप ताप दुख द्वन्द ।
ऐसी परम पुँनीत⁴कूं, तजै सो मूरख अन्ध ॥
दया बिना नर पतित है, दया बिना नर दुष्ट ।
दया बिना सुनवत बने, सबही थोथी गुष्ट ॥
जन्म मरण छूटै नहीं, नाहीं कर्म्म नशाहिं ।
दया बिना बदला भरै, चौरासी के माहिं ॥
काम क्रोध मोह लोभये, गरबआदि भजिजाहिं ।
चरणदास कहैं दया जो, घट में पहुंचै आहिं ॥
जितने वैरी जीव के, तिनमें रहै न एक ।
चरणदास यों कहत हैं, दया जो आवै नेक ॥
दुख भाजैं सुख हों घने, काया नगरी ढंग ।
१ बगुला २ जीवमारना ३ मट्ठा ४ पवित्र ॥
२०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ दयाअंग वर्णन ॥
दो० परमारथ में दया बड़, जो घट उपजै आय।
परगट हो निवैंरता१, कर्म गांठि खुल जाय ॥
थावर जंगम चर अचर, या जग में हो कोय।
सबही पै हित राखिये, सुखदानीही होय ॥
भोजन करौ सँभाल करि, पानी पीजौ छान।
हरावृक्ष नहिं तोड़िये, कर्म बचै यों जान ॥
औरौ बहुत विचारले, जामें लगै न कर्म।
यही तपस्या जानिये, यही दया यहि धर्म ॥
इक इन्द्री दो इन्द्रियां, ती इन्द्री अरु चार।
पंच इन्द्री लौं जीवकी, हिंसा अकस निवार ॥
खावै वस्तु विचारि कै, बैठै ठौर विचार।
जो कुछकरै विचारकरि, किरिया यही अचार ॥
मन सों रहु निवैंरता, मुख सूं मीठा बोल।
तन सूं रक्षा जीव की, चरणदास कहि खोल ॥
करुवा वचन न बोलिये, तन सूं कष्ट न देहु।
अपनासा जी जानिकै, बनै तौ दुख हरिलेहु ॥
मुख सूं जो करुवा कहै, तन सूं देवै कष्ट।
यही जु हिंसा जानिये, दया धर्मजा नष्ट ॥
दश इन्द्री मन ग्यारवां, करि विचारि ले जान।
इनहीं सूं सुख दीजिये, चरणदास पहिंचान ॥
काहू दुख नहिदीजिये, दुर्जन हो कै मीत।
सुखदायी सब जगतको, गहो दयाँ की रीत ॥
कोमलता परपीरता, सज्जनता निर्दोष।
१ किसी से लड़ाई न मानना ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २०३
सबही दया के अंग हैं, इन ते पावै मोष ॥
दया ज्ञान का मूल है, दया भक्ति का जीव ।
चरणदास यों कहत हैं, दया मिलावै पीव ॥
दया नहीं तौ कुछ नहीं, सबही थोथी बात ।
बाहर कथनी सोहनी, भीतर लागी घात ॥
छापे तिलक बनायकै, माला पहिरी दोय ।
दया बिना बक¹सम वहो, साधुरूप नहिं होय ॥
दया न आई घट बिषे, हीया बड़ा कठोर ।
यह नगरी कैसे बसै, तामें हिंसा² चोर ॥
पँडिताई बहुतै करी, दया न राखी जीव ।
छाँछि³ छाँछि तैं लै लई, डारि दिया तत घीव ॥
तोहिं पण्डित मैं कह कहूं, मूरख कै परवीन ।
लिया न तैं मत सूपका, चलनीका मतलीन ॥
दया गहेते सब नशैं, पाप ताप दुख द्वन्द ।
ऐसी परम पुंनीत⁴कूं, तजै सो मूरख अन्ध ॥
दया बिना नर पतित है, दया बिना नर दुष्ट ।
दया बिना सुनवत बने, सबही थोथी गुष्ट ॥
जन्म मरण छूटै नहीं, नाहीं कर्म्म नशाहिं ।
दया बिना बदला भरै, चौरासी के माहिं ॥
काम क्रोध मोह लोभये, गरवआदि भजिजाहिं ।
चरणदास कहैं दया जो, घट में पहुंचै आहिं ॥
जितने वैरी जीव के, तिनमें रहै न एक ।
चरणदास यों कहत हैं, दया जो आवै नेक ॥
दुख भाजैं सुख हों घने, काया नगरी ढंग ।
१ बगुला २ जीवमारना ३ मट्ठा ४ पवित्र ॥
२०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हिंसा रानी जो भजै, लेकर अपनो संग ॥
धन्य दया धनि शील कूं, जिनसे रीझे राम ।
गुरु शुकदेव बतावई, सबही सुधरै काम ॥
- इति दया का अंग सम्पूर्णम् ॥
( माया अंग वर्णन )
राग भैरव ॥
बैठा गुरु सूँ चलता चेला । सुखी होय रहै रैन अकेला ॥
दया क्षमा रख राम सुहाती । बात कहै करुई नहिंताती ॥
बिन जांचे उपदेश न दीजै । तरंकी¹ सूँ चर्चा नहिं कीजै ॥
मौन गहै थोरासा बोले । पलक न मिलै नैनरहै खोले ॥
दृष्टिराख नासाके आगे । सत्य वचन मीठा मुख भाषे ॥
रसना उलट अकाश चढ़ावै । बिनहीं बादल जल बरसावै ॥
पवन साधि मनकूं ठहरावै । कामिनि कनक रूप बिसरावै ॥
आसन अडिग² सुरत अनहद में। अन्तर खोल मिलै नहिं जगते ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । ऐसा होय महन्त कहावै ॥
दो० जो बोलै तौ हरिकथा, मौन गहै तौ ध्यान ।
चरणदास यह धारणा, धारै सो संज्ञान ॥
माया की अस्तुति करूं, होय रही संसार ।
अद्भुत लीला कर रही, शोभा अगम अपार ॥
माया सकल पसार है, नाना रँग बहु क्रान्ति ।
जहँलग यह आकारही, चंचल मिथ्या भ्रान्तिं³ ॥
जसे सुपना रैन का, मुख दर्पण के माहिं ।
भासै है पर है नहीं, ज्यों तरवर की छाहिं ॥
१ तर्क करनेवाले अर्थात् पाखण्डी २ किसी का लगाव न हो जिससे डिगे
नहीं ३ भर्मना ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २०५
यह माया सबकूं मोहै। वस होय न ऐसा कोहै ॥
यह बहुत सोहनी लागै। सबही नरनारी पागै ॥
कहिं चमक दमक बहुरूपा। अरु कहीं रंक कहिं भूपा ॥
अरु जहँ तहँ अधिक तमासे। वह भांति भांतिही भासे ॥
अरु जहँ लग सकल सवादा। कोइ करै जु वाद विवादा ॥
अरु काम क्रोध मोह लोभा। अरु मान बड़ाई शोभा ॥
अरु पांचौ इन्द्री जानौ। सब माया रूप पिछानौ ॥
अरु पांच¹ तत्त्व गुण तीनौ²। सो माया ही कूं चीन्हौ ॥
वह मकर पेच छले जानै। अरु पहर पहर बहुबानै ॥
गुरु शुकदेव जनावै। सब माया खेल दिखावै ॥
दो० जेते सुख संसार के, सबही माया जार।
तामें दो कणका धरे, एक द्रव्य एक नार ॥
लालच लागै चावसूं, गिरे आय करि लोय।
फँसे आपसूं आपही, गहि नहिं लाया कोय ॥
पांचौ इन्द्री सों लखै, सो माया आकार।
याहीसेती सब भयो, जहाँ लगहै साकार ॥
अरु माया रूप अनन्ता। कोइ जानै साधू सन्ता ॥
कहा सुना अरु देखा। सब माया रूप विशेखा ॥
आठ सिद्ध नौ माया। जहाँ जोगी तपी भुलाया ॥
अरु माया फंदे मांहीं। सब जीव आइ फँसि जाहीं ॥
वै नरक माहिं दुख पावैं। यम छप्पन त्रास दिखावैं ॥
फिर भुगतै लख चौरासी। वे गरभ योनि के वासी ॥
वे पशू देह धरि धावैं। नहिं मुक्त ठिकाना पावैं ॥
चरणदास कहैं नर चेतौ। तजौ मायाही सूं हेतौ ॥
१ पृथ्वी अप् तेज वायु आकाश २ सात्त्विक राजस तामस ॥
२०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० जगत बासना के तजे, माया की न बसाय ।
कर्म्म छुटै मिटै जीवता, मुक्तरूप हो जाय ॥
फँसे न इन्द्री स्वाद में, चरणकमल में ध्यान ।
पर आशा कोइ नारहै, लगै न माया बान ॥
सबमें अधिकी ज्ञान है, तासे ऊंचो ध्यान ।
ध्यान मिलावै पीवकूँ, पावै पद निरवान ॥
ध्याता ध्येय कैसे मिलैं, होय न विचमें ध्यान ।
तीनौ एक हुये बिना, लहै न पद निरवान ॥
इन्द्रिन के वश मन रहै, मनके वश रहै बुद्ध ।
कहौ ध्यान कैसे लगे, ऐसा जहां विरुद्ध ॥
जित जित इन्द्री जातहैं, तित मनकूँ लेजात ।
बुधिभी संगहि जात है, यह निश्चयकरि बात ॥
जित इन्द्री मनहूं गया, रही कहाँसूं बुद्धि ।
चरणदास यों कहत हैं, करि देखो तुम शुद्धि ॥
इन्द्री मनके वश करै, मन कर बुधिके संग ।
बुधि राखै हरि पद जहाँ, लागै ध्यान अभंग² ॥
इन्द्री मन मिल होत है, विषय वासना चाह ।
उपजै जैसे कामही, नारी मिल अरु नाहँ³ ॥
न्यारे न्यारे तत रहें, होत न कछू उपाध ।
जुदे राखमन इन्द्रियन, गुरुगम साधन साध ॥
इन्द्रीसूं मन जुदाकरि, सुरत निरतकरि शोध ।
उपजै ना विप वासना, चरणदास को बोध ॥
इन्द्री रोकेते रुकै, और जतन नहिं कोय ।
मन चंचल रिझवार है, रसिक सवादी सोय ॥
१ बैर २ जो भंग न हो ३ पति ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २०७
चंलौ करै थिर ना रहै, कोटि यतनकरि राख ।
यह जबही वश होयगा, इन्द्रिन के रस नाख ॥
न्यारे न्यारे चहतहैं, अपने अपने स्वाद ।
इन पांचौमें प्रीति है, कछू न वाद विवाद ॥
दुर्जन के फूटे बिना, तेरी होय न जीत ।
चरणहिंदास विचारिकरि, ऐसी कहिये रीत ॥
जुदी जुदी पांचौ कहौं, एक एक का भेद ।
जो कोइ इनकूं वशकरै, सबही छूटै खेद ॥
यह इन्द्री आंख विचारो । सो देत महा दुख भारो ॥
वह रागद्वेष उपजावै । अरु हरष शोक लै आवै ॥
सो रूप माहिं फँस जावै । तन मन में व्याधि उठावै ॥
वह देह औरके हाथा । करि डारै बहुत अनाथा ॥
वह फंदे माहीं डारै । अरु काम अगिनि में जारै ॥
यह डोलै दौरी दौरी । करचित बुधिकी गति औरी ॥
कोइ साधु शूरमा मोड़ै । जग सेती नैना तोड़ै ॥
कहैं चरणदास सुनि लीजै । कछु याका यतन करीजै ॥
दो० दीपक त्रिया निहारि करि, गिरै पतंग¹ ज्यों जाय ।
कछू हाथ आवै नहीं, उलटी आप जराय ॥
उन तन मन सभी जराया । कछु भोंदू हाथ न आया ॥
अरु विषय वासना फैला । जब छुटा रामका गैला² ॥
तौ मुक्ति कहां सों होई । दिया जन्म अकारथ खोई ॥
अब क्या शिरमारै कोई । घरहीं में दुर्जन सोई ॥
यह दृष्टि सदा की वैरी । जो सुरत बिगारै तेरी ॥
वह माया मोह लगावै । अरु चौरासी भरमावै ॥
१ पांखी २ रास्ता ॥
२०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शर्म सकुच सब खोवै । अरु बीज कुबुधि का बोवै ॥
यह ठग चोरी की बानी । अरु जार¹ करम अगवानी ॥
यह पानप सभी घटावै । यमपुर के त्रास दिखावै ॥
कहैं गुरू शुकदेवा । ये आंख महादुख देवा ॥
दो० ऐसी इन्द्री आंख की, सो अपनी नहिं होय ।
गुरु शुकदेव बतावई, चरणदास सुन लोय ॥
दर्शन कीजै साधु का, कै गुरु का कर लोय ।
जहाँ तहाँ ब्रह्म देखिये, दुबिधा दुर्मति खोय ॥
बैरी भिंतर एकै सा, एके रूप कुरूप ।
एसी होवै दृष्टिही, जब समझै मन भूप ॥
सुन दूजै इन्द्री काना। सो गुरु परतापै जाना ॥
जब सुनै काम रस रीता । तब भूलै पढ़ सुन गीता ॥
मन उपजै काम तरंगा । जब होत ध्यान में भंगा ॥
फिर लोभ बचन सुन औरै । जब तृष्णा चहुँदिशि दौरै ॥
कहिं द्रव्य हाथ लगि जावै । यों शोचि शोचि दुख पावै ॥
कहै ठग चोरी कर लाऊं । कहिं गड़ा दबाहो पाऊं ॥
काहू सुनै जु दौलत बंधा । मनही मन रोवै अंधा ॥
यों उपजै अधिकी लोभा । जब बढ़ै पापको गोभा ॥
कहैं चरणहिंदास विचारी । सुन चेतौ नर अरु नारी ॥
फिर सुनै बड़ाई कुल की । जब पुलक हंसत है मुलकी ॥
जो अपनी सुनै बड़ाई । जब अहूँ होत अकड़ाई ॥
फिर करन बड़ाई लागै । सोतां ज्यों कूकुर जागै ॥
जब उपजै बहु अभिमाना । अरु नेक न होवै नान्हा ॥
पर निन्दा बहुत सुहावै। नहिं और बड़ाई भावै ॥
१ छिनारा ॥
⁕ भक्तिपदार्थवर्णन । २०६
अहंकार बढ़ा मन माहीं। आधीन विना गति नाहीं ॥
सुनि उपजै तामस अंगा। जब करै बहुतही दंगा१ ॥
मन क्रोधरूप हो जावै। उठ उठकर मारन धावै ॥
कभी सुनै मोह के बैना। लगै हर्ष शोक दुख दैना ॥
जब सुनै कुटुंब की नीकी। तब करे खुशी बहु जीकी ॥
कोइ कुटुंब माहिं दुख पावै। सुन रोरो नैन गवाँवै ॥
जो हिरन कानवश हुवा। तौ तीर लाग करि मूवा ॥
शुकदेव कहैं यह जानौ। सब कान विकार पिछानौ ॥
दो० मन दै सुनिये हरि कथा, सुनिये हरियश कान ।
ताहि विचारिजु कीजिये, होय भक्ति का ज्ञान ॥
उपजै ज्ञान भक्ति अरु योगा। सुन सुन उपजैराम वियोगा ॥
उपजै प्रेम अनन्य उमाहा। होय उछाह दरशका चाहा ॥
सुन सुन उपजै लक्षण साधू। सुन २ पावै भेद अगाधू ॥
उपजै साधु संतकी सेवा। गुरुमुख होय सुनै यहि मेवा ॥
सुनि २ उपजै भय अरु लाजा। सोवै सकल सँवारन काजा ॥
सुनि सुनि यती सती हो जावै। न्हाहो अभिमान नशावै ॥
सुनि सुनि छूटै यमकी त्रासा। चौरासी में सहै न बासा ॥
सुनि सुनि चार पदारथ पावै। आवागवन के बीज जरावै ॥
सुनि सुनि काग हंस होजाई। चरणदास शुकदेव बताई ॥
दो० सुनि २ उपजै सुबुधिही, लागै हरिका रंग ।
सुनिसुनिउपजैकुबुद्धिही, खोटी उठै तरंग॥
ऐसी इन्द्री कानकी, जाके युगल सुभाव ।
कथा कीरतनहीं सुनौ, करि २ कोटि उपाय ॥
१ फिसाद ॥
२१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वचन सुनो गुरु साधुके, मनकूं लावो मोर ।
विषय वासनासूं निकस, आवै हरिकी ओर ॥
सरवन इन्द्री में कही, दोनों अंग दिखाय ।
जिह्वा इन्द्री कहत हैं, चरणदास चितलाय ॥
कुटिल जु इन्द्री जीभकी, चाहे षटरस स्वाद ।
यावश हो अवगुण करै, जन्म जाय बरबाद ॥
यह बहुत चटोरी कहिये । याही ते डरते रहिये ॥
यह चोरी भी करवावै । यह पकड़ बन्ध में पावै ॥
करै याही कारण जारी । यह करे बहुतही ख्वारी ॥
यह अपलें खान सिखलावै । अरु गाली मार दिलावै ॥
अरु बहुते झूठ बुलावै । हो मीत नरक लेजावै ॥
खेलै याही कारण जुवा । दुनियां में फिट फिट हूवा ॥
ये पांचौ ऐब सुनाऊं । रसना में सभी दिखाऊं ॥
यह महा अपरबल जानौ । अरु रणजीता हो मानौ ॥
दो० जिह्वा के जीते विना, गये जन्म सब हार ।
चरणदास यों कहत हैं, भये जगत में खार ॥
बंशी डारी ताल में, मछरी लागी आय ।
जिह्वाकारणजियदियो, तलफितलफि मरि जाय ॥
तजा न जिह्वा स्वादकूं, वा संग दीन्हे प्रान ।
जो कोइ ऐसा जगत में, सो अज्ञानी जान ॥
यासूं ले हरनामहीं, गुणावादही भाख ।
जो बोलै तौ सांचहीं, नाहीं मुखमें राख ॥
मीठा वचन उचारियो, नवता सबसूं बोल ।
हिरदैमाहिं विचारिकरि, जबमुख बाहरखोल ॥
१ नम्रता ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २११
बिना स्वादही खाइये, राम भजन के हेत ।
चरणदास कहै शूरमा, ऐसे जीतौ खेत ॥
जिन जीतौहै जीभकूं, जिन जीती सब देह ।
कहै गुरू शुकदेवजी, मुक्तिधाम फल लेह ॥
रसना जीतै भक्ति जो, सो योगी सो साध ।
अगम पन्थ मांह पगधरे, पहुँचै देश अगाध ॥
त्वचा सुइन्द्री काम की, नितही खेलें दाव ।
पशुपक्षी असुरा नरा, फँसे आपकरि चाव ॥
यह त्वचा सु मल मल मांजै । अरु काजल सुरमा आंजै ॥
यह तेल फुलेल लगावै । अरु चिकना गात बनावै ॥
अरु बस्तर भूषण पहिरै । करै अंजन मंजन गहिरै ॥
अरु लपटस की विधि ठानै । सव याही कूं सुखमानै ॥
अरु फँसे आय करि दोऊ । अब निकसन कैसे होऊ ॥
हित गांठ पेंच गहि दीन्हा । दोउ नेह वचन बहु कीन्हा ॥
अरु एक एकनै बांधा । वह समझै नहीं आधा ॥
अब शीश धुनै पछितावै । दोउ चले नरक कूं जावै ॥
कहै चरणदास नहिं जानौ । तुम औगुण ना पहिचानौ ॥
दो० त्वचास्वाद सब वश भये, फँसे जगत के माहिं ।
जो कोई निकमो चहै, सोभी निकसै नाहिं ॥
धोखे की हथिनी लखी, आयोगज ललचाय ।
खंदक माहीं रुकिगयो, शीशधुनै पछिताय ॥
कछू हाथ आयो नहीं, परो फन्द में जाय ।
मैन महावत वश भयो, शिरमें अंकुश खाय ॥
जङ्गल में आनन्दसूं, बहुतै केलि कराय ।
अबतौ द्वारे भूपके, परो बन्ध में आय ॥
२१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
ऐसेही यह नर फँधो, देखि कामिनी रूप ।
जन्म गँवायो दुखभरो, पड़ो अविद्या कूप ॥
करी न हरिकी भक्तिही, गुरु सेवा तजिदीन ।
सुनी न हरिकी गुणकथा, सतसंगत नहिंकीन ॥
फिर ऐसो कब होयगो, पावै मानुष देह ।
अबतौ चौरासी विषे, जाय कियो उन गेह ॥
जीतौ इन्द्री त्वचाकी, कहिया श्रीशुकदेव ।
यासे तपही कीजिये, चरणदास सुनलेव ॥
शीत उष्णका दुख नहिं मानै । कोमल सकत¹ एककरि जानै ॥
तपसूं काया उमर गवाँवै । अष्टसुगन्ध निकटनहिं जावै ॥
आन त्वचा² रूपरस नहिं करै । कामअग्नि हियमैं ना जरै ॥
काया तावन करनी ठानै । यही तपस्या मन में आनै ॥
त्वचा सु इन्द्री जीतौ ऐसे । मैं यह भेद बतायो जैसे ॥
गुरु शुकदेव बतावै सबही । चरणदास करितन सूं तपही ।
दो० त्वचासुं इन्द्री वश किये, छूटै काम क्लेश ।
यत शत शील सँतोषसूं, लगे न माया लेश ॥
त्वचा अंग पूरो कियो, कहूँ नासिका अंग ।
तावशअलिसुत जीदियो, जाको कहूँ प्रसंग ॥
बास आस गुंजत फिरो, बैठो कमल मँझार ।
सूर³ छिपेसे मुदिगयो, अब शिर दैदै मार ॥
कुंजर⁴ आयो तालपै, जल पीवन के काज ।
प्यासबुझी करने लगो, खेलकरिनको साज ॥
खेलकरत कमलहिगयो, लीन्ह्यो ताहि उपाड़ि ।
फेरिदियो मुख माहिंहीं, चाबिगयो देजाड़ि ॥
१ कड़ा २ देहकी खाल ३ सूर्य ४ हाथी ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २१३
ऐसेही ये नर फँसे, परे काल मुख जाय ।
चरणदास यों कहत हैं, चांले जन्म गवाँय ॥
सुगंध ओर हरषै नहीं, दुरगन्धै न रिसाय ।
ऐसे जीतै नासिका, मन भवँरा ठहराय ॥
समझनकूँ तुक एक है, भूलनकूँ तुकलाख ।
गुण अवगुण इन्द्री कहैं, सो तू मेन में राख ॥
जो इन्द्रिनके वश भयो, बांधो नरके जाय ।
चौरासी भरमत फिरै, गर्भयोनि दुख पाय ॥
जो इन्द्रिनके वशभयो, पावै ना आनन्द ।
बार बार जगमाहँहीँ, छूटै ना सम्बन्ध ॥
भक्तिमाहिं चित ना लगै, सबही बिगड़ैं काम ।
जो इन्द्रिनके वश भयो, ताको मिलै न राम ॥
चरणदास यों कहत हैं, इन्द्री जीतन ठान ।
जग भूलै हरि कूँ मिलै, पावै पद निरबान¹ ॥
इन्द्री जीतै सो ब्रह्मज्ञानी। इन्द्री जीतै सोई ध्यानी ॥
इन्द्री जीतै सो हरिदासा। अमरलोक में पावै बासा ॥
इन्द्री जीतै सोई सिद्धा। अष्ट कला अरु पावै ऋद्धा ॥
इन्द्री जीतै सोई शूरा। इन्द्री जीतै सो जन पूरा ॥
इन्द्री जीतै सो सतवन्ता। इन्द्री जीतै गुणी महन्ता ॥
इन्द्री जीतै राम रिझावै। इन्द्री जीतै सब कुछ पावै ॥
इन्द्री जीतै सो सन्यासी। इन्द्री जीतै सोइ उदासी ॥
इन्द्र जीतै सब फल दायक। इन्द्री जीतै सब कुछ लायक ॥
इन्द्री जीतै छुटै विदेसा। याजग में कुछलगै न लेशा ॥
इन्द्री जीतै परम सुखारा। निश्चय पहुँचै हरि दरबारा ॥
१ -ब्रह्मपद ॥
२१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
इन्द्री जीतै सो रणजीता । इन्द्री जीतै आतममीता१ ॥
इन्द्री जीतै ध्यान लगावै । सो निश्चय ईश्वर है जावै ॥
इन्द्री जीतै मिलै भगवन्ता । इन्द्री जीतै जीवनमुक्ता ॥
चरणदास सुनि कहैं शुकदेवा । इन्द्री जीतै सो गुरुदेवा ॥
दो० मन इन्द्रिन के वशभयो, होय रह्यो बेढंग ।
आपा बिसरो जग रलो, हुवो जो नाना रंग ॥
आवै तरंग क्रोधकी, होत जुवाँ२ के रूप ।
काम लहर कबहूं उठै, ताके होत स्वरूप ॥
लोभ कामना जब उठै, जभी लोभ रँग होय ।
मोह कलपना के उठे, मोह वरण हो सोय ॥
मनहीं खेलै खेल सब, मनहीं कर अभिमान ।
मनहीं यह जगद्वै रहो, अबसुनिमनकाज्ञान ॥
कबहूं यह मन होवै गिरही । कबहूं यह मन होवै विरही ॥
कबहूं यह मन होवै रोगी । कबहूं यह मन होवै शोगी ॥
कबहूं यह मन होवै नारी । कबहूं यह मन राखै ख्वारी ॥
कबहूं यह मन दौरा डोलै । कबहूं यह मन टेढ़ा बोलै ॥
कबहूं यह मन कुलका ऊंचा । कबहूं यह मन नकटा बूंचा ॥
कबहूं यह मन दुन्द मचावै । कबहूं क्षमा शील घर आवै ॥
कबहूं यह मन होवै दाता । कबहूं करै सूमसी बाता ॥
चरणदास कहैं मनकूं जानौ । ऐसी विधिमनकूं पहिंचानौ ॥
दो० बहुरूपी बहु रंगिया, बहुतरंग बहु चाव ।
बहुतभांति संसार में, करि करि घने उपाव ॥
यह मन राजा होवै भोगी । यह मन त्यागी होवै योगी ॥
यह मन होवै हरिका भक्ता । यह मन होवै योगरु जुक्ताँ। ॥
१ आत्माका जाननेवाला २ जेवानी. ३ उपाय करनेवाला ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २१५
यह मन होय विवेकी ज्ञानी । यह मन तपिया जपिया ध्यानी ॥
यह मन करै दयाकी बातें । यह मन करै जीव की घातैं ॥
यह मन यती सती अरु शूरा । यह मन काशी पण्डिंत पूरा ॥
यह मन तीरथ बर्त्त उपासी । यह मन ठकुरानी अरु दासी ॥
यह मन होवै देवी देवा । या मनका कोइ लहै न भेवा ॥
यह मन प्रेमी नेभी जनहीं । चरणदास कहैं सब कुछ मनहीं ॥
दो० या मनके जाने विना, होय न कबहूँ साध ।
जक्त वासना ना छुटै, लहै न भेद अगाध ॥
तैं मनकूं जाना नहीं, करी न याकी सार ।
चौरासी छूटी नहीं, उपजा वारंवार ॥
मनकूं सतसंगति लै जावो । कानो हरियश कथा सुनावो ॥
भांति भांति के रँग ललचाव । तौ हरिके रँग क्यों न रँगावै ॥
तौ याको ज्ञानीही कीजै । जक्त ओर जानै नहिं दीजै ॥
कै दीजै हरिहीका ध्यानू । राम भक्ति में याकूं सानू ॥
कै कीजै यह योगी पूरा । याहि सुनावो अनहद² तूरा ॥
या मनकूं कीजै वै³रागी । याकूं कीजे सर्वस त्यागी ॥
जग रँग उतरि ब्रह्म रँग लागै । जाते कर्म भर्म भय भागै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । मन फेरनि की राह दिखावै ॥
दो० मन् ने आप गवाँइया, ज्ञान' बुझाया दीव ।
करमलगा भरमतफिरो, मिला न अपना पीव ॥
दौरि दौरि रसओरही, होय रहा कंगाल ।
नातरु आगे भूपथा, ऊंचा बड़ा दयाल ॥
पांचौ इन्द्री स्वाद में, भयो निपट आधीन ।
राजबड़ाई सब नशी, भयो मूढ़ मति हीन ॥
१ विचार करनेवाला २ ब्रह्मशब्द का बाजा ३ प्रेमसे अलाहिदा ॥
१६
२१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सरकिजाय विषओरही, बहुरि न आवै हाथ ।
भजनमाहिं ठहरै नहीं, जो गहि राखूं बाथ ॥
मन निश्चल आवै नहीं, निकसि २ भजिजाय ।
चरणदास यों कहत हैं, काहूकी न बसाय ॥
पविहारे ज्ञानी तपी, रहे बहुत शिर मार ।
मन परेत सूं डर लगै, लै डूबै मँझधार ॥
यह मन भूत समान है, दौड़े दांत पसार ।
बांस गाड़ि उतरै चढ़ै, सब बल जावै हार ॥
यों आतम में मन धरै, होय जहां लौ लीन ।
ठहरि रहै फिरिना चलै, सकल विकल हो क्षीन ॥
भजै तौ जानि नदीजिये, घेरि घेरि करि लाव ।
या मन कूं परचाय करि, ध्यानहिं माहिं लगाव ॥
और कहौं विधि दूसरी, सुनियो चित्त लगाय ।
रामनाम मनसूं जपै, चंचलता थकिजाय ॥
पवन रुकै जब मन थकै, और दृष्टि ठहराय ।
ऐसी साध न साधिये, गुरुगम भेद मिलाय ॥
इन्द्री रोकै मन रुकै, अरु उत्तम विधि एहु ।
चरणदास यों कहत हैं, यह साधन करि लेहु ॥
इन्द्रिन कूं मन वश करै, मनकूं वशकरै पौन ।
अनहद वशकर वायुकूं, अनहदकूं ले तौन ॥
याको नाम समाधि है, मन तामें ठहराय ।
जन्म जन्मकी वासना, ताकूं दग्ध¹ कराय ॥
इन्द्री पलटै मन बिषे, मन पलटै बुधि माहिं ।
बुधि पलटै हरिध्यानमें, फेरि होय लै जाहिं ॥
१ जलाना ॥