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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 690 में से

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पृष्ठ 260

भक्तिपदार्थवर्णन । २२३
घटो बढ़ो तुम नाहिं सदा पूरन रहो ॥
आदि अंत सब सृष्टि के पुरुष अनन्त जू ।
नितही इकरस रहत तुमही भगवंत जू ॥
जो तुम ऐसी भांति कहो हरि देव जू ।
हमसो उत्पति भई तुम्हारी भेव जू ॥
तुमतो कैसी भांति हमें पहचानई ।
स्तुति ऐसी भांति कैसे के बखानई ॥
दो० ऐसी बुद्धि हमरी भई, तुम्हरे ही परताप ।
हम तो चरणहिं दास हैं, तुमही करता आप ॥
अष्टपदीछन्द ॥
यह सब किरपा नाथ तुम्हारी जानियै ।
ना तो केतिक बुद्धि हमारी मानियै ॥
तुमही सगरी सृष्टि के कारन रूप हो ।
तुम उपजावन पालन मारन रूप हो ॥
ज्यों घट नाना भाँति यों ही संसार है ।
फूटे मांटी होय सभी यों विचार है ॥
ऐसेही इक ब्रह्म सकल व्यापक सदा ।
नाम अनेक कहाय हम बरने कहा ॥
निराकार निरलिप निरगुन करतार हो ।
अपने भक्तन हेत लेत अवतार हो ॥
तुमरी लीला नाथ जो परम सुहाई ।
जो जन कहै और सुनै हिये में लावई ॥
ते जन लहत पुनीत जो पद निरबान कूं ।
अंतकाल तुम्हें मिलत जो ऐसे ज्ञान सूं ॥
तुमरी भक्ति अनन्य जो कोई जन करै ।