भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दारा सुत अरु बंधु हितू मन आनिये ।
मिथ्या सब व्यवहार जक्त को जानिये ॥
जो जन इन के मांहिं बंधे चित देवई ।
कवहूं मुक्ति न होय जन्म फिर लेवई ॥
मन वच करके प्रीति जो तुमसों साजई ।
कर्म बन्ध कट जांय मुक्ति पुर राजई ॥
तुमरे जन जे लोय जु गिरह को परहरें ।
तुम कारनही नाथ बहुत तीरथ करें ॥
जेते तीरथ होहिं गंग कूं आदि दै ।
तुम चरणोदक होय वहै तीरथ सबै ॥
तुम चरणन के ध्यान मगन निशि दिन रहें ।
तुम्हरी अमृत कथा सुनैं नित सुख लहैं ॥
इहि विधि तुमसों प्रीति सदा जु निवाहई ।
विना भक्ति वे मुक्ति कवहूँ नहिं चाहई ॥
और वस्तु की चाह कहा मन लावई ।
छिन में सबको नाश न कुछ ठहरावई ॥
उनके मनके मांहिं कछू इच्छा नहीं ।
बन में कारन कोन रहै निशि दिन वहीं ॥
तन मनहू की आप कछू उन सुधि नहीं ।
वे तो मृत्यु समान फिरें जग मांहि ही ॥
इहि विधि ऐसी भांति जु कोऊ जन रहै ।
जन्म सुफल तिहि होय जक्त में सुख लहै ॥
विमुख होहिं तुमसों जो प्रानी मूढ़ही ।
पशु समान वे लोय अज्ञानी गूढ़ही ॥
याहि जक्त के मांहिं कर्म नहिं होय जू ।