भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २१६
इन कूं समझ धरै हिय कोई । पूरा गुरुमुख कहिये सोई ॥
प्रथमहिं गुरुसों झूठ न बोलै । खोटी खरी करै सब खोलै ॥
दूजे गुरुको पयं¹ न लगावै । निश्चय गुरुके चरण मनावै ॥
तीजे आज्ञाकारी जानौ । इन लक्षण गुरुमुखी पिछानौ ॥
जो कोई गुरुका लेवै नाम । ताको निहुरि करै परणाम ॥
जो कहुं देखै गुरुका बाना । जाकूं जानै गुरू समाना ॥
चरणदास शुकदेव बखानै । गुरुभाई कूं गुरुसम जानै ॥
दो० गुरुभाई कूं पूजिये, धरिये चरणन शीश ।
चरणोदक² फिरिलीजिये, गुरुमत बिश्वाबीश ॥
जो कहुं गुरुका बस्तर पावै । हिये लगाय चूम दृगल्यावै ॥
गुरू देश का मानुष आवै । दै परिक्रमा बलि बलि जावै ॥
कहै दया करि दर्शन दीन्हें । मेरे पाप भये सब क्षीन्हे ॥
जो अपने गुरुद्वारे जइये । देखत पौरि बहुत हरषइये ॥
हांईं सूँ दण्डवत जु कीजै । दर्शन करिकरि सर्वस दीजै ॥
फिर ठाढ़ो रहै जोरे हाथा । बैठे तब आज्ञा दे नाथा ॥
जो बोलैं सो मन में धरिये । अपने अवगुण सबही हरिये ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । ऐसा गुरुमुख राम रिझावै ॥
दो० साधुन की निंदा बुरी, मत कोइ कीजो भूल ।
दुनिया में दुख पायहैं, रहैं नरक में झूल ॥
साधुका निन्दक तन मन दुखी । साधुका निन्दक होय न सुखी ॥
निन्दक साधु दरिद्री होय । निंदक डारै सर्वस खोय ॥
साधुका निंदक नरक मँझार । निश्चय खावै यमकी मार ॥
साधुका निंदक पूरा पापी । साधुका निंदक डूबै आपी ॥
मूरख होय सो निन्दा करै । साधु संत कूं अवगुण धर ॥
१ किसी प्रकार का झूठा दोष २ चरणों का धोयाहुआ जल ॥