भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
साधुका निन्दक श्वान समान। साधुका निन्दक शूकर जान ॥
साधु रामकी कहिये देह। निन्दक के मुख माहीं खेह॥
चरणदास निन्दा तजि दीजै। भक्तोंकी अस्तुतिही कीजै ॥
दो० साधोंकी अस्तुति किये, हरिकी अस्तुति होय ।
भक्तों की निन्दा किये, प्रभुकी निन्दा सोय ॥
श्रीनिकुंजविहारिणे नमः ॥
अथ श्रीशुकदेव मुनिराज महाप्रभु के शिष्य श्रीश्यामचरणदास
जी महाराज रचित वेदस्तुति लिख्यते ॥
दो० भक्ति पदारथ कारने, देहुं वेद की साख ।
ताको भेद मिलाइये, चरणदास कहैं भाख ॥
गुरु शुकदेव प्रताप सों, कहूं वेद को वाक ।
संस्कृत भाषा करी, आदि सनातन साख ॥
नारद सू नारायनहि, देव लोक सनकाद ।
शुकदेव परिक्षित सों कही, मैं कहूं सुनियो साध ॥
अष्टपदीछन्द ॥
श्री शुकदेव गुरु के बचन विचार के ।
वेद स्तुति की कथा कहूं उरधार के ॥
भक्ति प्रापत होय जक्त ब्याधा नसे ।
अंत मुक्ति पद पाय अमरपुर जा बसे ॥
श्री भागवत पुराण दस्म असकंध में ।
कही कथा सुखदान हिये के हुलास तें ॥
राजा परिक्षित कहत श्रीशुकदेव कों ।
मोहिं कहो समझाय सकल याभेव कों ॥
हरि स्तुति भलिभांति सूं वेदन गाइहैं।
निर्मल परम पुनीत सो मोमन भाइहैं ॥