भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 261, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें२२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जन्म सुफल तिहि होय मुक्ति पर पग धरै ॥
प्रेम मगन ज्यों साधु तेरो गुन गावईं ।
होय सु महाप्रसाद प्रीति सों पावईं ॥
जोगेश्वर चित लाय जू तुमकूं ध्यावईं ।
प्रान वायु कूं खैंच त्रिकुटी लावईं ॥
हृदय कमल के मांह तुमहि कूं देखई ।
अद्भुत रूप सरूप अनूपम पेखई ॥
अगम पंथ भगवान तुम्हारो जानिये ।
कहन शक्त परमान कोउ हिय आनिये ॥
अगम पंथ इह भांति तुम्हारो नाथ जू ।
पहुँच सके किहिं भांति सुनो यह बात जू ॥
भक्ति तुम्हारी नाथ स्मृति वरनन करैं ।
पावैं इस विधि तोंहि प्रीति तुमसों करैं ॥
तुम्हरी भक्ति अनूप हिये में धारई ।
चार पदारथ संत कबहु चाहत नहीं ॥
ऐसे लक्षन होहिं तुम्हारे भक्त के ।
अंतर प्रेम अगाध बाहर जड़ रूप से ॥
मन के मांहीं ध्यान तुम्हारो ही बसे ।
कबहुँ रोव आप कबहु आपहि हंसे ॥
हंसत तुम्हारे ध्यान बहु हरखाय के ।
देख दशा संसार रोवे पछताय, के ॥
कबहु मगन मन होय ध्यान दृढ़ कर गहै ।
साजे तुम्हरी भक्ति जहां चित्त दे रहै ॥
बिना भक्ति कुछ और न जिय में जानई ।
बिरले ऐसे कोय जक्त में मानई ॥