भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 271, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें२३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तिनमें दो बलवन्त हैं, एक द्रव्य इक नार ॥
नारि किये दुख बहुत हैं, बन्धन बँधै अनेक ।
जो सुख चाहै जीवका, तिरियाकूं मत पेख ॥
द्रव्य माहिं दुख तीन हैं, यह तू निश्चय जान ।
आवत दुख राखत दुखी, जात प्राणकी हान ॥
ताते इनकी प्रीति मन, उठै तभी निरवार ।
ये दुर्जन दुख रूप हैं, ऐसो करो विचार ॥
जो कोई इनमें पगै, तिन सें छूटै राम ।
चरणदास यों कहत हैं, क्यों पावै हरिधाम ॥
हेरि फेरि धनको करत, बीतै पहर इकरात ।
तीनपहर निशिके रहैं, खोवै नारी साथ ॥
नारी के फैलाव को, दीखै ओर न छोर ।
द्रव्य माहिं तृष्णा रहै, चाहै लाख किरोर ॥
द्रव्य जोरि मरिजय जब, हो बैठे तहँ नाग ।
नारी में जो चित रहै, ह्वैहै कूकुर काग ॥
ऐसेही भरमत फिरै, लख चौरासी देह ।
कनक कामिनीकूं तजै, जबलग नाहीं नेह ॥
मूरख त्याग न करिसके, ज्ञानवन्त तजि देह ।
चौंकायल मृग ज्यों रहै, कहीं न साजै गेह ॥
जो कोइ छोड़ै कुटुंबही, ऐसी कर पहिंचान ।
जैसे छूटै बन्ध सूं, यम जोरासूं जान ॥
जीवत यम तौ कुटुंब है, घेरि घेरि दुख देय ।
ऐसे मानुष देहकूं, लूटै ही नित लेय ॥
कै ठग सबकूं जानिये, कै धाड़ी के चोर ।