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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 690 में से

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पृष्ठ 266

भक्तिपदार्थवर्णन । २२६
का बिधि तुमरी भक्ति करें सब लोय जू ॥
जब लग तुम्हरी भक्ति हिये नहिं लावई ।
तब लग कैसी भांति मुक्ति पद पावई ॥
कीजै सबही कर्म धर्म की रीतिही ।
याही बिधि भगवान सों उपज प्रीतिही ॥
जब लग भक्ति की रीति न मन में आवई ।
तब लग कर्म की रीति न छोड़ गंवावई ॥
बिधि सों सगरे कर्म सोई नर साजई ।
अंत होय निहकर्म मुक्ति पुर राजई ॥
कर्म भक्ति को त्याग जु कोऊ जन करै ।
घोर नर्क के मांहिं सोई प्रानी परै ॥
जग में मनुष शरीर वृक्ष सम जानिये ।
तिहि ऊपर द्वै पक्षी ही पहिचानिये ॥
एक पक्षी तिही मांहिं ताको फल पावई ।
अतिही दुर्बल छीनि दृष्टि में आवई ॥
दूजो पक्षी कछु न जाको फल लहै ।
मन में अति आनन्द लसत नितही रहै ॥
वसुधा में जो भक्त तुम्हारे कहावई ।
रैन दिवस चित आप तुम्हीं सों लगावई ॥
तिनकूं सगरे देव बहुत भरमावई ।
अष्ट सिद्धि नव निद्धि को लोभ दिखावई ॥
लोभ कर सिध देख निद्धि पर मन वहै ।
भक्ति पदारथ सोय जो कैसी बिधि लहै ॥
अति अद्भुत इहि भांति ब्रह्माण्ड बनाइया ।
सातही तत्त्व के संग सोई लिपटाइया ॥