भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 272, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २३५
रणजित कहै तु देखले, लूटत हैं निशि भोर ॥
बाहर कलकल करत हैं, भीतर लावहिं लाव ।
ऐसो बांधौ खैंचकरि, छुटै हाथ नहिं पाव ॥
लाजतौंक गलमें पड़ा, ममता ,बेरी पांय ।
रसरी मूरुख नेह की, लीन्हे हाथ बँधाय ॥
डारि दियो अज्ञान में, परो परो बिललाय ।
निकसनकूं जबहीं चहै, कुतका मोह लगाय ॥
रखवारे जहँ पांच हैं, इन्द्रिन के रस जान ।
तबहीं देह भुलायकै, जो कुछ उपजै ज्ञान ॥
कुटुँब ओर इन पांच को, एक मतोही जान ।
प्राणी कूं जग में फँसा, चहै खान अरु पान ॥
ये सब स्वारथही लगें, इसका सगा न कोय ।
जो शिर मार धरणि पर, कल्प कल्प करि रोय ॥
मात पिता सुत नारि की, इनकी उलटी रीति ।
जग में देह फँसाय कै, करिकै प्रीतिहि प्रीति ॥
जैसे बधिक बिछाय कै, जाल माहिं कण डार ।
प्रीति करै पक्षी गहै, पाछे करै जु खार ॥
जैसे ठग बहु प्यार करि, भोलापनहीं देह ।
पहिले लडू खवाय कै, पाछे सरबस लेह ॥
हित सूं हिरण बुलाय कै, गोली मारै तान ।
चरणदास यों कहतहैं, ऐसे इन कूं जान ॥
जलमें बंशी डारिया, अटकाया जहाँ मास ।
मछरी जानै हित कियो, लखो न अपनो नास ॥
भोंदू यह गति ना लखी, पड़ो कुमति के फंध ।