भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 270, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिभुवन उजागर कृपासागर द्वंद संकट मोचनं ।
प्रेम मदमाते रहें नित शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
निरालम्भ निहभर्म निशि दिन स्थिर बुद्धि निकेतनं ।
धर्मधारी ब्रह्मचारी शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
पतितपावन भर्म नशावन शरणागत सुखदायकं ।
मायाजीतं गुणातीतं शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
श्रीशुकदेव अष्टक परम सुन्दर पठत पाप नशायकं ।
चरणदास शुकदेव स्वामी भक्ति मुक्ति फलदायकं ॥
इति अष्टक ॥
अथ मोह छुटावन अंग वर्णन ॥
कुंडलिया ॥
भक्ति दृढ़ावनकूं कहे नानाही परसंग ।
शुकदेव कृपा सों अब कहूं मोहछुटावन अंग ॥
मोह छुटावन अंग कोई हियमाहीं धारै ।
कुटुँब जालसुं छूटि लगै हरिचरणौ लारै ॥
चरणदास यौं कहत हैं उपजै मन वैराग ।
जक्त नींदही सूं खुलै चौथे पदमें जाग ॥
दो० गुरू पूजि जग छोड़िये, भवसागर के द्वन्ध ।
साधुनकी संगति करौ, तजौ जाति कुलबन्ध ॥
बन्धु नारि सुत कुटुँब सब, यमकी फांसी जान ।
तोहिं छुटावैं रामसूँ, इनका कहा न मान ॥
खैंचि पकड़ि ह्वां राखिहैं, जहां मोह का जाल ।
जीवत दुख बहु भांतिके, मुये नरक ततकाल ॥
या प्राणीकूं ठग लगै, सकल कुटुँब परिवार ।