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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 690 में से

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पृष्ठ 264

भक्तिपदार्थवर्णन । २२७
चौरासी के माहिं सदा भरमत रहै ॥
जौं जन मन ते आप माया को परिहरै ।
हरि के चरनों मांहिं ले चित अपनो धरै ॥
परम भक्त जो होय जक्त के मध्य ही ।
जीवन मुक्ति को पाय कछू संशय नहीं ॥
माया ही के संग मोह उन लाइया ।
तिहि कारन नर जीव जु नाम कहाइया ॥
अहंकार के संग सों छूटत हैं जबै ।
परमातम अरु ब्रह्मरूप होवें तबै ॥
मनुष रूप को जन्म दुर्लभ जग मांहिं हैं ।
देवन हूं को कठिन परापत नाहिं है ॥
सकल देव ईहिं भांति मनोरथ नित करैं ।
मनुष जन्म को पाय के भवसागर तरैं ॥
नर शरीर को नवका समझी जानिये ।
वेद पुरानन मांहिं जु साख पिछानिये ॥
सतगुरु खेवट रूप हिये में आनिये ।
या नवकाको पार लगावन जानिये ॥
अलख ईश भगवान जो कृपा निधान है ।
भवसागर के तरन को रूप विधान है ॥
तिन के शरने आय चरणही दास हो ।
प्रेमा भक्ति अनन्य करे निरवास हो ॥
याही विधि सों पार न होवे नर कोई ।
आतम घाती जीव जान लीजे सोई ॥
पुनि चौरासी लक्ष कि योनि मझारही ।
भ्रमत रहत इहिं भांति जु बारंबारही ॥