भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पहिले धरती तत्त्व हिये में आनिये ।
ताते दस गुनों नीर जीय में जानिये ॥
बहुर अग्नि अरु पवन और आकाश है ।
षष्ठम् अहम् जु तत्त्व सदा परकाश है ॥
महत्तत्त्व रोसी भांत जु चित में जनिये ।
अष्टम मायारूप सकल पहिचानिये ॥
जो नहिं होत अशक्त जक्त व्यवहार में ।
मन में तुम्हरी भक्ति धरै संसार में ॥
माया के शिर पांव जो धर के भक्तही ।
लोक तुम्हारे मांहिं जाय पहुँचत वही ॥
आदि अंत अरु मध्य संपूरण सकल में ।
घटत बढ़त तुम नाहिं कबहुँ कल विकल में ॥
प्रभु महिमा हम नाथ हिये नहीं जानईं ।
और लोक किहि भांति सोबरन बखानईं ॥
सरगुण स्तुति करि जु यह निरबानही ।
निरगुन रूप अरूप कूं कैसे बखानई ॥
या धरती के रत्न सभी गुन लीजिए ।
तो सरूप गुन सकै न गिनती कीजिए ॥
और बहुत पखंड तुम्हीं माहीं रहै ।
तिनहूँ को हम अंत कछू नाहीं लहैं ॥
तिहि कारन हम करें तुम्हें परनाम हो ।
जय जय श्री भगवान जागो सुखधाम हो ॥
वेद स्तुति इह भांति सबन मन भाइ है ।
सकल ऋषिन को भाष जु सनक सुनाई है ॥
तबै सकल ऋषि चाव सों मिल पूजा करी ।