भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 255, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें२१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० सांच बिना साधू नहीं, कबहुं न मिलिहैं राम ।
सांच बिना गतिनालहै, पावै ना निजधाम ॥
सत सतमुखसूं बोलिये, सतही चलिये चाल ।
सतही मनमें राखिये, सतही रहिये नाल ॥
सांचे कूं ग्रह ना लगै, सांचे कूं नहिं दाग ।
सांचे शाप न लागई, सब दुख जावै भाग ॥
बड़ी तपस्या सांच है, बड़ा बरत है सांच ।
जासों पाप सभी जरैं, लगै न गर्मको आंच ॥
जाका वचन मुड़ै नहीं, सांचे सब व्यवहार ।
चरणदास त्रयलोक में, कभी न आवै हार ॥
सांचे के मनहीं में राम । सांचा करै न छल के काम ॥
सांचा होकर सुमिरण करै । आप तरै औरन लै तरै ॥
सतवादी की पति है सांच । ताकूं लगै न दिव की आंच ॥
सांचे चोर चुराया घोड़ा । परमेश्वर ताका रँग मोड़ा ॥
और चोर चोरीसूं गया । सांच प्रताप अचम्भा भया ॥
औरे सांच प्रताप अनन्ता । सबही जानै साधू सन्ता ॥
लाख बातका एकहि जोड़ । सांचा पुरुष सबन शिरमोड़ ।
आवै सांच परम सुख पावै । चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
दो० सांचे की पदवी बड़ी, दुष्ट साध के माहिं ।
दोनों अस्तुतिही करें, निन्दक कोई नाहि ॥
गुरू कहै सो कीजिये, करै सो कीजै नाहिं ।
चरणदास की सीखसुन, यही राखि मनमाहिं ॥
कथा सुनी ब्रतहू किये, तीरथ किये अघाय ।
गुरुमुख के होये विना, जप तप निर्फल जाय ॥
अब गुरुमुख के लक्षण गाऊं, जुदे जुदे करि सब समझाऊं ॥