भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 263, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें...मीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
२२४ श्री...
...ंग वह निहकर्महीं जो होय है ।
जन्म...
...क पदारथ पंथ न पावत कोय है ॥
विषय भोग रस स्वाद जोई जन पर हरै ।
भक्ति जोग दृढ़ होय जहां मन लै धरै ॥
तुम बिन और न चहै गहै पर नाम को ।
लहै तुम्हारो नाम रहे विश्राम सों ॥
जो नर जग के मांहिं इन्द्रिन के बस रहै ।
कीट योनि के मांहिं जन्म सोई लहै ॥
बहुर लेत जड़ योनि मांहिं अवतारही ।
फिर आवत है पशुकी योनि मझारही ॥
तिहि पीछे नर देह वही जो पावई ।
पहिले ही वह नीच योनि में आवई ॥
बहुरो ऐसे चार चरण में अवतरै ।
ऐसे बिषई लोय बहुत भरमत फिरै ॥
माया तुम्हरी अपार सुचतुर कहावई ।
एकै रूप अनेक भांति दिखलावई ॥
विविध वरन सों होय भासे साकारही ।
उनही रच्यो सब जक्त जहां लौं आकारही ॥
वृक्ष की छाया देख सरोवर नीरही ।
छेरी मन ललचाय आई वा तीरही ॥
वह तो इतनी शक्ति कहां सों पावई ।
जासों ही वह निकट वृक्ष के आवई ॥
या विधि प्रानी सबै माया में डूबई ।
नाहीं तो वह आप काहू व्यापत नहीं ॥
माया ही के माहिं जो कोऊ जन बंधे ।