भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २१७
दग्ध वासना होय जब, आवागमन नशाय ।
कहें गुरू शुकदेवजी, मुक्तरूप है जाय ॥
मनके सगरे भेदही, जाको दियो जिताव ।
चरणदास अब कहत हैं, झूठ सांच को न्याव ॥
जो कोइ बोलै झूठही, ताकूं लागै पाप ।
जन्म जन्म छूट नहीं, दुखदे तीनौ ताप१ ॥
बोल झूठ महा अपराधी । धरम लुटै उठिलागै बाधी ॥
झूठा सौ सौ सौगँद खाय । झूठा लेवै कर्म लगाय ॥
झूठा करै बिराना बुरा । झूठा रहै जक्त में गिरा ॥
झूठे की परतीति न होई । झूठा बोल न बोलै कोई ॥
झूठा हरिकी भक्ति न पावै । झूठा घोर कुण्ड में जावै ॥
झूठेकूं लागै यम मार । झूठा चौरासी में ख्वार ॥
झूठ वचन का भारी दोष । झूठे की होय गती न मोष ॥
झूठे के नहिं गुरू न राम । झूठेकूं नाहीं विश्राम ॥
चरणदास शुकदेव बताव । झूठे सबी नरककूं जावें ॥
दो० झूठे के मुँह दीजिये, नौसादर का वाप ।
डरा करै सकुचा रहै, वह शरमिंदा आप ॥
झूठेकूं हत्यारा जानौ । झूठेकूं ठग चोर पिछानौ ॥
झूठा कुटिल शराबी होय । झूठा कहिये कामी सोय ॥
झूठेही को जानो ज्वारी । समझि देखि सबही नर नारी ॥
सकल ऐब झूठ में पाऊं । एक एक क्या खोल दिखाऊं ॥
पांचौ खोंट सबन के राजा । सो मैं कहे चितावन काजा ॥
झूठ पाप की कहिये खानि । सो यह करै पुण्यकी हानि ॥
सबही अवगुण झूठे माहीं । चरणदास शुकदेव बताहीं ॥
१ दैहिक दैविक भौतिक ॥