भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२६
पावक सों पानी भयों, पानी धरती सोय ॥
धरती मीठे स्वाद है, खारी स्वाद सुनीर ।
अग्नि चरपरो स्वाद है, खट्टो स्वाद समीर ॥
खट्टा मीठा चरपरा, खारी पर मन होय ।
जबहीं तत्त्व विचारिये, पांच तत्त्व में कोय ॥
स्वाद नाप ओर रंग है, और बताई चाल ।
पांच तत्त्वकी परख यह, साधि पाव ततकाल ॥
तिरकोनी पावक चले, धरती तौ चौकोर ।
शून्यस्वभाव अकाशको, पानी लांबो गोल ॥
अग्नि तत्त्व गुण तामसी, कही रजोगुण बाय ।
पृथ्वी नीर सतोगुणी, नभ है अस्थिर¹ भाय ॥
नीर चलै जब श्वास में, रण ऊपर चढ़ि मीत ।
वैरी को शिर काटकरि, घर आवै रणजीत ॥
पृथ्वी के परकास में, युद्ध करै जो कोय ।
दोउ दल रहैं बराबरी, हारि वायु मैं होय ॥
अग्नि तत्त्वके बहतही, युद्ध करन मति जाव ।
हारि होय जीतै नहीं, अरु आवै तन घाव ॥
तत अकाश में जो चलै, तौ ठाईं रहिजाय ।
रणमाहीं काया छुटै, घर नहिं देखै आय ॥
जल पृथ्वी के जोग में, गर्भ रहै सो पूत ।
वायु तत्त्व में छोकरी², आंबर सूतक सूत ॥
पृथ्वी तत्व में गर्भ जो, बालक होवे भूप ।
धनवन्ता सोइ जानिये, सुन्दर होय स्वरूप ॥
अग्नि तत्त्व जब चलत है, कभी गरभ रहिजाय ।
१ न चलसकै २ लड़की ॥
१३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
गर्भ गिरे माता दुखी, हो माता मरि जाय ॥
वायु तत्त्व स्वर दाहिने, करै पुरुष जब भोग ।
गर्भ रहै जो तासमै, देही आवै रोग ॥
आसन संयम साधिकरि, दृष्टि श्वास के माहिं ।
तत्त्व भेद यों पाइये, बिन साधे कुछ नाहिं ॥
आसन पदम लगायकै, एक बरत नित साध ।
बैठे लेटे डोलते, श्वासाही आराध ॥
नाभि नासिकामाहिंकरि, सोहं सोहं जाप ।
सोई अजपा जाप है, छुटै पुण्य अरु पाप ॥
भेद स्वरोदय बहुत है, सूक्ष्म कह्यो बनाय ।
ताको समझिबिचारिले, अपनो चित मनलाय ॥
धरणि टरै गिरिवर टरै, ध्रुव टरै सुन मीत ।
वचन स्वरोदय ना टरै, कहै दास रणजीत ॥
शुकदेव गुरूकी दया सों, साधु दया सों जान ।
चरणदास रणजीत ने, कह्यो स्वरोदय ज्ञान ॥
छप्पै—डहरे में मेरो जनम नाम रणजीत पिछानो ।
मुरली को सुत जान जात दूसरि पहिंचानो ॥
बाल अवस्था माहिं बहुरि दिल्ली में आयो ।
रमत मिले शुकदेव नाम चरणदास धरायो ॥
जोग जुक्ति हरि भक्तिकरि ब्रह्मज्ञान दृढ़करि गह्यो ।
आतम तत्त्वविचारिकैअजपा में मन सनिरह्यो ॥
इति श्रीचरणदासजीकृतज्ञानस्वरोदयसंपूर्णम्
हंसनाथउपनिषद्वर्णन । १३१
अथ श्रीचरणदासकृत पंचउपनिषद्
अथर्वणवेद भाषा प्रथम
हंसनाथलिख्यते ॥
दो० बन्दत श्री शुकदेव को, उनको हिय में लाय ।
छिप्यो भेद परगट कियो, परमारथ के दाय ॥
संस्कृत भाषा करि, ताको यह दृष्टान्त ।
खोलि खोलि सबही कही, समझै छूटै भ्रान्त¹ ॥
ज्यों कूंएं सों नीर लै, बाहर दियो भराय ।
विना यतन कोई पियो, तिरषावन्त² अघाय ॥
पो दीन्ही शुकदेव ने, मैं जल काढ़नहार ।
प्यासा कोइ न जाइयो, टेरों वारंवार ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य जो, अरु शूद्रहु जो होय ।
वह पीवैगा हेत करि, बहु प्यासा जो कोय ॥
मुक्तिहु नीकी प्यास जो, काहूही को होय ।
और मनुष जग प्यास में, रहे जु मृतक होय ॥
यह जग ऐसो जानिये, मृगतृष्णा को नीर ।
निकट जाय प्यासा कोई, कभी न भागै पीर ॥
उनकी प्यास बुझै नहीं, होय नहा हिय चैन ।
ज्ञान सुधा तजि जात है, धोखे को जल लैन ॥
ज्ञान नीर तिरपत भये, निश्चल बैठे दास ।
संसारी प्यासे गये, पूरी भई न आस ॥
१ भ्रम २ पियासा ॥
१३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
संस्कृत था कूप सम, भाषा नीर निकास ।
प्याऊं जिज्ञासून को, तिनकीं भगै पियास ॥
अष्टपदी ॥
वेदहि की उपनिषद् जु मैं भाषा करी ।
जो कुछ था वहिमाहिं सोई जैसे धरी ॥
सुनि समझै मन माहिं, और करनी करै ।
आवागमन मिटाय नहीं देही धरै ॥
जगकी व्याधा¹ छूटि मुक्तिपद पावई ।
जाग्रत पहुँचे ठौर स्वप्न बिसरावई ॥
तिमिर² सभी भजिजाय उजारा होय है ।
सूझै आतम रूप द्वैँतता खोय है ॥
उपजै अति आनन्द द्वन्द दुख जाय है ।
तिरंपति निर्मलज्ञान विज्ञान अघाय है ॥
जोपै करै विचार और गुरुसों लहै ।
वाकी गहनी गहै और रहनी रहै ॥
गुरु शुकदेव प्रताप सो चितते गाइया ।
चरणहिदासा होय सबन शिर नाइया ॥
दो० पूजे ऋषि मुनि देवता, पूजे इन्द्रहु भूप ।
पूजा सबही इष्ट को, देखा हरि के रूप ॥
सर्वत्रहि प्रभु देखिकरि, सबको शीश नवाय ।
उपनिषदैं जो वेद की, परगट कहीं बनाय ॥
अष्टपदी ॥
प्रथम प्रगट करी छिपेही भेदकी ।
हंस नामऽहंनाम अथर्वणवेद की ॥
१ दुःख २ अन्धकार ॥
हंसनादूउपनिषद्वर्णन । १३३
गौतमऋषि करि चाव ऋषीश्वर पै गये ।
संत सुजातजु नाम बहुत आदर किये ॥
गौतम स्तुति करी बहुतही प्रीति सों ।
फिरि पूंछी यह बात जु लघुता रीति सों ॥
परमेश्वर पहिंचान मोहि समुझाइये ।
मुक्तहोन के पन्थ सबै जु दिखाइये ॥
ह्वैकर बहुत प्रसन्न* ऋषीश्वर बोलिया ।
गौरा अरु महादेव की चरचा खोलिया ॥
सब देवन के देव महादेव हैं सही ।
उपनिषदें जो वेद कि गौरा सों कही ॥
सो मैं तुमसों कहौं प्रीति के भाव सों ।
तुमहूं नीके सुनौ अधिकही चाव सों ॥
गुप्त महा यह भेद हिये में राखिये ।
जो जड़ मूरख होय तासु नहिं भाखिये ॥
दो० हरिभक्ता अरु गुरुमुखी, तप करने की आस ।
सतसंगी सांचा यती१, ताहि देहु चरनदास ॥
अष्टपदी ॥
अब मैं कहौं संभाल सुरत ह्वां दीजिये ।
यह तौ अचरज कथा श्रवण सुनि लीजिये ॥
यही श्वास कहि हंस आय अरु जाय है ।
पूरा सतगुरु मिलै तौ भेद लखाय है ॥
जो कोउ याको समझि करै अरु ध्यानहीं ।
ऋद्धि सिद्धि सुखहोहिं जु उपजै ज्ञानहीं ॥
अन्त मुक्तिही होय अभैपद में रहै ।
१ योगी ॥
१३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बहुरौ जन्म न होय परम आनँद लहै ॥
अब मैं वरणौं हंस और परमहंसही ।
जो समझे है ब्रह्म जाय सब संशही ॥
हंस हंस जो मंत्र अर्थ पहिचानिये ।
वह मैंहूँ यों कहै निश्चय करि जानिये ॥
यह मंतर सब माहिं सदाही भरि रह्यो ।
कोटिन में कोई जानि ध्यान सोइ धरि रह्यो ॥
जैसे काठ में आगि तिलों में तेल है ।
तैसे सब घटमाहिं इसी का मेल है ॥
दो० दूध मध्यज्यों घीव है, मेहँदी माहीं रंग ।
यतन बिना निकसनहीं, चरणदास सो ढंग ॥
जो जानै या भेदकौं, और करै परवेश ।
सो अविनाशी होत है, छूटै सकल कलेश ॥
अष्टपदी ॥
तन मथने को यतन कहूँ अब जानिये ।
ज्यों निकसै ततसार विलोवन ठानिये ॥
पहिले चक्र जानि मूल द्वारे बिषे ।
जितही पाँव की एँडी सूं बन्ध दे रखे ॥
मूल चक्रसों खैंचि अपान चलाइये ।
दूजे चक्र पास जु आनि फिराइये ॥
दहिनी ओरसों तीनि लपेटे दीजिये ।
तीजे चक्र माहिं गमन फिरि कीजिये ॥
चौथे चक्र माहिं पवन जो लाइये ।
बहुरौ पाँचवें चक्र में जू पहुंचाइये ॥
षष्ठम चक्र माहिं जु तांहि चढ़ाइये।
हंसनादउपनिषद्वर्णन । १३५
सो त्रिकुटी के मध्य तहां ठहराइये ॥
रोकै त्रिकुटी माहिं आनिके वायुको ।
षट्चक्र को भेदि चढ़ै जव धायको ॥
अपान वायु चढ़िजाय वहीं अस्थान है ।
प्रान वायु द्वै जाय साधु कोइ जान है ॥
रोकै प्रानहि वायु त्रिकुटी मध्यही ।
ओं का करै ध्यान शीश में मध्यही ॥
यह तौ ऊंचा ध्यान जु अधिक अनूपही ।
चरणाहदासा होय जु ब्रह्म स्वरूपही ॥
दो० नाम ब्रह्म का है नहीं, है तो ॐकार ।
जानै आपन को वही, मैं हौं तत्त्व अपार ॥
अष्टपदी ॥
अनहद शब्द अपार दूर सों दूर है ।
चेतन निर्मल शुद्ध देह भरपूर है ॥
ताहि निःअक्षर जानि और निष्कर्म है ।
परमातम तेहि मानि वही परब्रह्म है ॥
हृदय कमल के माहिं ध्यान सोहं करै ।
वाहि को अजपा जान सुरति मन लै धरै ॥
बिनहिं जपे जप होय- सुसांची बातही ।
सहस इक्कीस अरु छस्सौ जहां दिन रातही ॥
याको कीजै ध्यान होत है ब्रह्मही ।
धारै तेज अपार जाहि सब भ्रमही ॥
वा पटतर कोइ नाहिं जु योंहीं जानिये ।
चन्द सूर्य अरु सृष्टि के माहिं पिछानिये ॥
सो वह तेज अपार आपको मानिये ।
११
१३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निश्चय अरु वहि सांच जु मनमें आनिये ॥
जब लग वाही भेद जो जाना था नहीं ।
जीवातम अरु हंस होरहा था तहीं ॥
जभी अगोचर१ भेद जु मनमाहीं लहा ।
परमातम परमहंस रूप निश्चय भया ॥
दो० जो जीवातम सो भया, परमातम अरु ब्रह्म ।
वाकी सरवर को करै, पाई परै न गम्य ॥
पहुँचै ना वा तेज को, कोटिकोटि ही भान ।
चरणदास कोइ जानहीं, ताको निर्मलज्ञान ॥
अष्टपदी ॥
परम ज्योति को प्राप्त सो नर होत है ।
जिन मन जीता होय लगाया गोत२ है ॥
जिन मन जीता नाहिं विषय आशा बहै ।
हृदय कमलदल आठ 'तहं फिरता रहै ॥
अष्ट पैंखरी जान जु आठौ अंगही ।
वही दिशा हैं आठ करै मन भंग ही ॥
'पंखरी पूरव दिशा जबै मन जात है ।
तब इच्छा हिय पुण्य करन की आत है ॥
अग्नेय दिशा है पैंखरी जब जावै मना ।
ऊंघ नींद अरु आलस जित आवै घना ॥
दक्षिणहिं जु दिशा पैंखरी राजई ।
उपजै बहुत किरोध कठोरता साजई ॥
दिशा जु नऋत पैंखरी पै मन रंगही ।
पाप करन की उपजै हिये तरंग ही ॥
१ न देखपड़ना २ बुड़ी ॥
: हंसनाद् उपनिषद् वर्णन । १३७
पश्चिम दिशा जु पैंखरी पै मन आरहै।
होय खुशी परफुल्ल जु लीला को चहै ॥
दो० बायब दिशा जु पैंखरी, जब मन पहुँचै जाय ।
हलन चलन उपजै हिये, बैठे देहि उठाय ॥
अष्टपदी ॥
उत्तर दिशा जु पैंखरी पै मन आवई ।
मैथुन करनकि चाह हिये उपजावई ॥
ईशान दिशा पैंखरी पर मन आवै जभी ।
दान करन की चाह अधिक उपजै तभी ॥
हृदय कमल के बीच जबै मन जारहै ।
उपजि त्याग वैराग तजन जगको कहै ॥
हृदय कमल को छेदि बाहर मन फिरतही ।
आंसे पांसे जानि होय जाग्रत ही ॥
हृदय कमल के घेर के मध्यम जातही ।
जब आवै वह स्वप्न जहां बहु भांति ही ॥
धान बराबर छेदि तहां मन जात है ।
होहि सबै गुण लीन सखौ पतियात है ॥
हृदय कमल को छोड़ि होय जब न्यारही ।
तुरिया में मन जात जु तत्त्व अपारही ॥
यों जीवातम जान जु अनहद लीन हो ।
सो परमातम होय जीवता जाय खो ॥
दो० अजपाही के जापको, सिद्ध भयो जब जान ।
पहुँचै या अस्थानहीं, रहै न दूजा ज्ञान ॥
यह जो सब कुछ मैं कहो, हिरदै जाना जाय ।
ताही को पहिंचानिये, चरणदास चितलाय ॥
. १३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी ॥
कैसे अनहद उठै हिये अस्थान सों ।
यह जीवातम सुनै हृदय बल ध्यान सों ॥
दश प्रकार के नाद कहूं भिन्न भिन्नही ।
सो उपनिषदहि माहिं कहे सब चिह्नही ॥
पहली ऐसे होय चिड़िया ज्यों चीला ।
एकबार कहै चिह्न सुनौ सोई सुरंतला ॥
ऐसेही दोबारा जु दूजी जानिये ।
चिह्न चिह्नही होत ताहि पहिचानिये ॥
क्षुद्रघंटिका तीसरि चौथी शंख ज्यों ।
पंचम ऐसी जान बजत है बीन त्यों ॥
छठीं बजै ज्यों ताल सातवीं बाँसुरी ।
अठवें शब्द मृदङ्ग लगै मन गाँसुरी ॥
नवें नफीरी नाद जु दशवें सिद्धि है ।
बादर कीसी गरज ददह दहंद है ॥
करते में अभ्यास जु नाद सब खुलैं ।
जैसे बटाऊ १ चलत नगर नौ मग मिलैं ॥
दशवें पहुँचे जाय नवें बिसराइया ।
रहत किया वा देश जहां घर छाइया ॥
ऐसेही नौ छोड़ नाद दशवां गहै ।
बादल कीसी गर्ज जहां मन दे रहै ॥
वाकों छोड़ै नाहिं सदा रहै लीनहीं ।
यही जु अनहद सार जानि परबीनहीं ॥
याको प्राप्त कहूं जो मन में आनिये ।
१ रोस्ता चलनेवाला ॥
हंसनादउपनिषद्वर्णन । १३६
गौरासों शिव कह्यो सांच करि जानिये ॥
दो० चरणदास ने अब कही, जुदी जुदी दशनाद ।
वही परापत को लहै, जो कोई साधै साध ॥
अष्टपदी ॥
पहिलि परीक्षा जान जु अनहद नादकी ।
सबै रोमावलि उठै जु वाके गातकी ॥
अरु दूजी जब सुनै नाद चित लावई ।
सब तन अंगन माहिं आलकस आवई ॥
तीजी अनहद नाद सुनै जितही जुटै ।
सब अंगन हियमाहि प्रेम पीड़ा उठै ॥
चौथि सुनै जब नाद परीक्षा पावई ।
तब शिर घूमनलगै अमल¹ ज्यों खावई ॥
पचवीं उठै जो नाद सुनै तामें पगै ।
वाके शीश सों जानि अमी² उतरन लगे ॥
छठा उठै जब नाद सुरति वामें धरै ।
कण्ठ सों नीचे उतरि अमी पीवन करै ॥
सतवीं खुलै जो नाद बिना श्रवणन सुनै ।
अन्तर्यामी होय लखै सबके मनै ॥
दूर दूर के वचन सुनै कोई कहै ।
होय परे की दृष्टि छिप्यो कछु ना रहै ॥
अठविं परीक्षा जानि परापत जो बनै ।
सब माहीं सबठौर नाद अनहद सुनै ॥
है सबही के मांझ बैन समझै सुनै ।
यह समझै अरु सुनै ताहि नीके गुनै ॥
नशा २ अमृत ॥
१४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० खुलै नवां जब नादहीं, लक्षण यह पहिंचान ।
सूक्ष्म होय जित तित गमन, करै धरै जो ध्यान ॥
काहू हीकी दृष्टि सों, चहै अगोचर होन ।
होय सकै दीखै नहीं, वह सब देखै जोन ॥
जैसे सुर सबको लखैं, उन्हें न देखै कोय ।
रणजित कहै अस्थूलहो, चाहे सूक्ष्म होय ॥
अष्टपदी ॥
दंशवीं खुलै जो नाद परे सोहंपरे ।
पारब्रह्म होइजाय ध्यान ताको करै ॥
ध्यानी को मन लीन होय अनहद सुनै ।
'आप अनाहद होय वासना १ सब भुनै ॥
पाप पुण्य छुटिजाय दोऊ फल ना रहें ।
होय परमकल्याण जु त्रैगुण २ ना गहैं ॥
होवै बोध स्वरूप तेज ह्वै जात है ।
अटक रहै नहिं कोय सबै ठां समात है ॥
अज अविनाशी शुद्ध पवित्र सत्तही ।
होवै आनँदरूप परम जो तत्त्वही ॥
'निर्विकार निर्लेप और निर्बानहीं ।
आनंद सबको देत आपको जानहीं ॥
या ध्यानी को नाम जु ॐकार है ।
सब नामनमें बड़ा किया जु विचार है ॥
'याको ऐसे मानै कि वह जो मैंहीं हूँ ।
रूप नाम गुण जान कि यह सब वाहीसूं ॥
दो० करतै अनहद ध्यानही, ब्रह्मरूप ह्वै जाय ।
१ मनकी इच्छा २ सत् रज तम ॥
˙हंसनादू उपनिषद् वर्णन । १४१
चरणदास यों कहत है, वाधा सब मिटिजाय ॥
˙इति हंसनाद् उपनिषद् सम्पूर्णम् ॥
अथ सर्वोपनिषद् द्वितीय प्रारंभः ॥
दो० दूसरि जो उपनिषद है, ताको कहौं बनाय ।
सर्व नाम तिहि जानिये, ताहि देहुँ प्रकटाय१ ॥
अष्टपदी ॥
परजापति२ के शिष्य जो पूँछी आयकै ।
वन्ध मुक्ति का भेद देहु समझायकै ॥
काहि कहत हैं वन्ध मोक्ष कासों कहैं ।
विद्याऽविद्या३ भेद कहौ कैसे लहैं ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति मोहिं बतलाइये ।
अरु तुरिया को भेद सभी जु सुनाइये ॥
कोठे पांच को भेद गुरू वर्णन करो ।
जुदा जुदा समझाय तिमिर४ दुबिधा हरो ॥
पहिल अन्न सों भरा दुजा भरा प्रान सों ।
तीजा मन सों भरा चौथ बुद्धि रानिस ॥
पँचवाँ आनँद भरा मोहिं कहि दीजिये ।
हौं तौ चरणहिंदास कृपा जो कीजिये ॥
आतम को जो अकर्ता कैसे कै कहैं ।
किन अनर्थ सों जीव जु याही को ठहैं ॥
अरु कहैं याको देहका जाननहार. है ।
१ जाहिर करना २ ब्रह्मा ३ माया ४ अँधियारा ॥
१४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
देह को साक्षी कहै सो कौन विचार है ॥
दो० ऐसो यह बन्धन बँधो, कहैं तज्ञ निर्बन्ध ।
अन्तर्यामी क्यों कहैं, मोहिं बताओ सन्ध ॥
आतमहीं को क्यों कहैं, जीव आतमा मान ।
माया यासों कहत हैं, दूरि करो अज्ञान ॥
अष्टपदी ॥
परजापति सब सुनिकै यह उत्तर दिया ।
आतमहीं का ज्ञान सभी परगट किया ॥
जीव आतमा देह मानिकै मैं कहैं ।
ताते परो अज्ञान सबै दुख सुख सहैं ॥
आपको लम्बाजान कि ठिंगना१ जानई ।
कबहूँ दुबला जान कि मोटा मानई ॥
आपको जानै वृद्ध कि बालक तरुन२ है ।
जानत नारी पुरुष जु मानत बरन है ॥
देह संग ह्वै देह करै जु विहार है ।
आपन कोगयो भूलि रहै न विचार है ॥
वाको बन्धन यही सुनो चितमें धरो ।
देह भाव छुटिजाय मुक्ति निश्चय करो ॥
जाही वस्तु सों उपजै तन अभिमान है ।
वही अविद्या जान वही अज्ञान है ॥
यही भरम उठिजाय जिसी जु विचार सों ।
वाही विद्या जानि वही कों ज्ञानहूँ ॥
दो० चौदह इन्द्री देवता, मिलि जो करैं व्योहार ।
चरणदास यों कहत हैं, जाग्रत यही निहार ॥
१ छोटा २ ज्वान ॥
सर्वोपनिषद् वर्णन । १४३
जीव जु अन्तःकरणके, चारौ देवत संग ।
सूक्ष्म देही साथही, देखै स्वप्ना रंग ॥
चौदहही सब लीनहै, जीव आतमा माहिं ।
यही सुषुप्ति जानिये, कछु भी सूझै नाहिं ॥
अष्टपदी ॥
तीन अवस्था मिटैं मिटैऽहंकार है ।
तुरियाही रहिजाय जु तत्व अपार है ॥
परमातम जो पुरुष सदा निर्लेव है ।
केवल ज्ञान स्वरूप जु ब्रह्म अभेव¹ है ॥
अब कोठों की बात कहूं चितदीजिये ।
जुदा जुदा विस्तार सबै सुनिलीजिये ॥
पहला कोठा कहूँ अन्नसेती भरो ।
छह कोठे तेहि माहिं सोई श्रवणन धरो ॥
तीन पिताकी ओर सो लाया संगही ।
बीरज मींगी हाड़ सफ़ेद जु रंगही ॥
अब माता के अंश तीनिहीं जानिये ।
लोह त्वचा अरु मांस अरुण पहिचानिये ॥
प्रानसे कोठा भरा दशौ जहां वायु है ।
अगले भी छः कहे जु रहे समाय है ॥
तीजा कोठा जानि धरो तहँ शुद्धिही ।
मन चित अरु अहंकार भरी जहँ बुद्धिही ॥
चौथा कोठा देख इन्हीं का जानना ।
तामें भरो है ज्ञान सभी को पिछानना ॥
पाँचवाँ कोठा जानि जो आनंद सों भरा ।
१ जो न जानाजाय ॥
१४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जैसे सगरो वृक्ष बीजमाहीं धर्रा ॥
दो० चारौ कोठे जो कहे, अरु कारण को देखि ।
जहाँ सभी ये रहत हैं, वा ठौरी को पेखि ॥
वा ठौरी को जानिये, ज्यों तरुवर को बीज ।
डाल पात फल फूलही, रहै जु वाके बीच ॥
ऐसे वाको समझिकै, रहै जु आनँद आहि ।
आनँदही आनँद भरा, पाँचवें कोठे मांहि ॥
अष्टपदी ॥
आतम करता जानु जु जामें बुधि रहै ।
दुख सुख वाही माहिं सभी आशा गहै ॥
इच्छा पूरी भये होत मन मोद¹ है ।
जब पूरी नहिं होय घना दुख होत है ॥
दुख सुख दोनों होत जो पांचन के बिषे ।
सो वे इन्द्री जान बिना इनके कसे ॥
सरवन² सों सुनि शब्द बुरा भल को यही ।
और त्वचा सों जान सपँर्श³ कि होयही ॥
आंखन सों लखि होय जु रूप कुरूपसों ।
अरु जिह्वा सो होय जु षटरँस स्वाद सों ॥
नासासेती होय बुरी भलि गंध ले ।
इनसे उतपति होय जु दुख सुख भै अभै ॥
आतम को जीवातम इस कारण कहैं ।
सूक्ष्म⁵ अरु अस्थूल⁶ देह संगही रहैं ॥
बुरे भले जो करमन के फल में बँधा ।
१ आनन्द २ कान ३ छूना ४ खट्ठाखारी मीठा करुवा चरफरा कपैल
५ हलका ६ मोटा ॥
सर्वोपनिषद्वर्णन । १४५
बीचहि लिया लगाय नहीं धुरसों फँधा ॥
ज्यों कञ्चन के संग जु टांका जानिये ।
१धौले बस्तर साथ जु मैल पिछानिये ॥
शोधे से है दूर शुद्ध है जात है।
अपनेहिं अङ्गन आय जु श्वेत दिखात है ॥
जीवातम इहि भांति फलन त्यागन करै ।
आतमहीं रहिजाय जीवता ना रहै ॥
खोटे कर्म जु त्यागि भले सहजै करै ।
तिनका फल जो होय नहीं आशा धरै ॥
दौ० जीव ब्रह्म यों होत है, रहै न कछू लगाव ।
चरणदास यों कहत हैं ऐसा किये उपाव ॥
अष्टपदी ॥
देह को जाननहारा ऐसे मानई ।
सूक्ष्म अरु अस्थूल को अपनी जानई ॥
कबहुँ कहै मम शीश आंख मुख हाथ है ।
कभी बतावै पांव कहै मेरा गात है ॥
मन बुद्धि चित-अहङ्कार समझ ये चार हैं ।
अरु पांचों है वायु जु कोइ निहार है ॥
प्राण अपानहि व्यान उदान समान हैं ।
सात्त्विक राजस तामस तीनों जानि हैं ॥
वैर प्रीति अरु तीसरि इनकी द्वूँद्व है ।
चौथा मनोरथ तौनिक सब मिलि झुंड है ॥
भले बुरे जो कर्म और मन आनिये ।
सूक्ष्म शरीर को मूल ये सब पहिचानिये ॥
१ सफेद ॥
:१४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अरु यह सूक्ष्म शरीर आतमा साथ' जो ।
ताते भासतं सत्य सत्य है बात सो ॥-
जब आतम पहिंचान हिये में आवई ।
तब सूक्ष्म को सांच सबै उठि जावई ॥
दो० सूक्ष्म शरीररु आतमा, भिन्न लखै नहिं कोय ।
यही जु मन की गांठ है, खुले मुक्ति ही होय ॥
जाने जाननहारही, और तीसरी जान ।
इन तीनों को जो लखै, सो साक्षी परधान२ ॥
उपजै तीनों द्वैत सों, मिटै एकता होय ।
उपजन मिटना तीनका, जानै न्यारा सोय ॥
अपनेही परकाश में, आप रहा परकास ।
सोई साक्षी जानिये, कहै चरणहीं दास ॥
यद्यपि बन्धन में बँधा, कहै जु निर्बंध दूर ।
चींटी ब्रह्मा आदिलौं, हिरदय में भरपूर ॥
सबही हिरदय के मिटे, वही एक ठहराय ।
ना कुछ आया ना गया, ज्योंका त्यों रहिजाय॥
बन्धन में आवै सही, लीला करन दयाल ।
निरबंधैं का निरबंध रहै, अजअबिनाशिअकाल॥
अंतर्यामी के अरथ, सब घट रहो समाय ।
जैसे डोरेके विषे, भांतिभांति मणिकाया॥
सबही के भीतर बसै, सबका जाननहार ।
वाहीते परगट भई, नाना वस्तु अपार ॥
घनेरूप किरिया घनी, घनेनाम दृष्टान्त५ ।
१ दिखात २ मुख्य 'जाननेवाला ३ जो बँधा हुआ न हो ४ मणि
समूह ५ मिसाल ॥
सर्वोपनिषद्वर्णन । १४७
सूझ ज्ञानप्रकाश सूं, जब गुरु मेटै आन्त१ ॥
रूप नाम किरियालगी, जबलग याके साथ ।
याहीते जी आतमा, कहलावै यह बात ॥
जैसे कञ्चन मृत्तिका, भांड़े किये संचार ।
नामरूप किरिया भई, देखो दृष्टि निहार ॥
रूपनाम किरिया मिटै, रहै न कछू विचार ।
जो था सोई रहगया, परमातम ततसार ॥
आतम अरु जीवात्मा, देह धरे से दोय ।
ताते बढ़ो उपाधही, मैं तू तू मैं होय ॥
तत्त्वम२सी जो यह कहा, ताको याहीं अर्थ ।
वह तूही हैं जानले, परम तत्त्व है सत्य ॥
अष्टपदी ॥
अरु वह ज्ञान स्वरूप अनन्द अनन्त है ।
उपजावन सब सृष्टि को जीवन कन्त है ॥
वस्तु काल अस्थान तीनों मिटि जातु है ।
वह एकरस सतरूप ब्रह्म रहिजातु है ॥
सब को जाननहार मिटै उपजै नहीं ।
तासूं कहैं वहि ज्ञान अर्थ जानो तहीं ॥
और कहैं जु अनन्त सो यासूं जानिये ।
सब भांड़े में इक माटी जु पिछानिये ॥
कनक के बरतन बहुत जु सोना एकिये ।
सब बसनन के माहिं जु सूतहि देखिये ॥
ऐसेहि आदिरु अन्त ब्रह्म सब माहिं है ।
कहिये याहि अनन्त भेद कछु नाहिं है ॥
१ हृदय का संदेह २ वेदान्त ॥
१४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अरु जो आनँद कहै समझ लीजो वही ।
वाही को अंश पिछान जु आनँद हो कही ॥
ऐसेही मोहिं समझायो गुरु शुकदेव ने ।
चरणहिंदासा होय लखो या भेवने ॥
दो० चार पते ये ब्रह्म के, सत आनन्द अनन्त ।
चौथा ज्ञानस्वरूप है, कहैं वेद अरु सन्त ॥
अष्टपदी ॥
सर्व समय सब ठौर जु एकरस नित्त है।
तत्वंमसी के अर्थ वही तू सत्य है ॥
जब तू करिकै ज्ञान होय परब्रह्महीं ।
आपनहीं कूं पाय जाय सब भर्महीं ॥
मैं तू वह उठिजाय दूसरी वासही ।
आपकुव्यापक जान ज्यों शुद्ध अकासही ॥
अरु जानै निर्लेप सत्त अरु एकही ।
जब परमातम होय रूप नहिं रेखही ॥
माया याते कहैं भरम अरु अन्त है।
ज्ञान भये उठिजाय कछू न रहन्त है ॥
ज्यों रसरी को साँप भरम सूं मानिये ।
समझ लखा जब झूठी माया जानिये ॥
सांच सो लागै झूठ झूठ सच जान है।
माया यही सुभाव भरम अज्ञान है ॥
रसरी कूं कहैं सर्प जु अपने भरम सूं ।
ऐसेही जड़ कहत सनातन ब्रह्म कूं ॥
दो० झूठ जगत दीखत रह, दीखै ना सत ब्रह्म ।
१ मतलब २ वेदान्त ॥