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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 690 में से

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पृष्ठ 172

: हंसनाद् उपनिषद् वर्णन । १३७
पश्चिम दिशा जु पैंखरी पै मन आरहै।
होय खुशी परफुल्ल जु लीला को चहै ॥
दो० बायब दिशा जु पैंखरी, जब मन पहुँचै जाय ।
हलन चलन उपजै हिये, बैठे देहि उठाय ॥
अष्टपदी ॥
उत्तर दिशा जु पैंखरी पै मन आवई ।
मैथुन करनकि चाह हिये उपजावई ॥
ईशान दिशा पैंखरी पर मन आवै जभी ।
दान करन की चाह अधिक उपजै तभी ॥
हृदय कमल के बीच जबै मन जारहै ।
उपजि त्याग वैराग तजन जगको कहै ॥
हृदय कमल को छेदि बाहर मन फिरतही ।
आंसे पांसे जानि होय जाग्रत ही ॥
हृदय कमल के घेर के मध्यम जातही ।
जब आवै वह स्वप्न जहां बहु भांति ही ॥
धान बराबर छेदि तहां मन जात है ।
होहि सबै गुण लीन सखौ पतियात है ॥
हृदय कमल को छोड़ि होय जब न्यारही ।
तुरिया में मन जात जु तत्त्व अपारही ॥
यों जीवातम जान जु अनहद लीन हो ।
सो परमातम होय जीवता जाय खो ॥
दो० अजपाही के जापको, सिद्ध भयो जब जान ।
पहुँचै या अस्थानहीं, रहै न दूजा ज्ञान ॥
यह जो सब कुछ मैं कहो, हिरदै जाना जाय ।
ताही को पहिंचानिये, चरणदास चितलाय ॥