सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 183

१४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अरु जो आनँद कहै समझ लीजो वही ।
वाही को अंश पिछान जु आनँद हो कही ॥
ऐसेही मोहिं समझायो गुरु शुकदेव ने ।
चरणहिंदासा होय लखो या भेवने ॥
दो० चार पते ये ब्रह्म के, सत आनन्द अनन्त ।
चौथा ज्ञानस्वरूप है, कहैं वेद अरु सन्त ॥
अष्टपदी ॥
सर्व समय सब ठौर जु एकरस नित्त है।
तत्वंमसी के अर्थ वही तू सत्य है ॥
जब तू करिकै ज्ञान होय परब्रह्महीं ।
आपनहीं कूं पाय जाय सब भर्महीं ॥
मैं तू वह उठिजाय दूसरी वासही ।
आपकुव्यापक जान ज्यों शुद्ध अकासही ॥
अरु जानै निर्लेप सत्त अरु एकही ।
जब परमातम होय रूप नहिं रेखही ॥
माया याते कहैं भरम अरु अन्त है।
ज्ञान भये उठिजाय कछू न रहन्त है ॥
ज्यों रसरी को साँप भरम सूं मानिये ।
समझ लखा जब झूठी माया जानिये ॥
सांच सो लागै झूठ झूठ सच जान है।
माया यही सुभाव भरम अज्ञान है ॥
रसरी कूं कहैं सर्प जु अपने भरम सूं ।
ऐसेही जड़ कहत सनातन ब्रह्म कूं ॥
दो० झूठ जगत दीखत रह, दीखै ना सत ब्रह्म ।
१ मतलब २ वेदान्त ॥