भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अरु जो आनँद कहै समझ लीजो वही ।
वाही को अंश पिछान जु आनँद हो कही ॥
ऐसेही मोहिं समझायो गुरु शुकदेव ने ।
चरणहिंदासा होय लखो या भेवने ॥
दो० चार पते ये ब्रह्म के, सत आनन्द अनन्त ।
चौथा ज्ञानस्वरूप है, कहैं वेद अरु सन्त ॥
अष्टपदी ॥
सर्व समय सब ठौर जु एकरस नित्त है।
तत्वंमसी के अर्थ वही तू सत्य है ॥
जब तू करिकै ज्ञान होय परब्रह्महीं ।
आपनहीं कूं पाय जाय सब भर्महीं ॥
मैं तू वह उठिजाय दूसरी वासही ।
आपकुव्यापक जान ज्यों शुद्ध अकासही ॥
अरु जानै निर्लेप सत्त अरु एकही ।
जब परमातम होय रूप नहिं रेखही ॥
माया याते कहैं भरम अरु अन्त है।
ज्ञान भये उठिजाय कछू न रहन्त है ॥
ज्यों रसरी को साँप भरम सूं मानिये ।
समझ लखा जब झूठी माया जानिये ॥
सांच सो लागै झूठ झूठ सच जान है।
माया यही सुभाव भरम अज्ञान है ॥
रसरी कूं कहैं सर्प जु अपने भरम सूं ।
ऐसेही जड़ कहत सनातन ब्रह्म कूं ॥
दो० झूठ जगत दीखत रह, दीखै ना सत ब्रह्म ।
१ मतलब २ वेदान्त ॥