भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहंसनादउपनिषद्वर्णन । १३६
गौरासों शिव कह्यो सांच करि जानिये ॥
दो० चरणदास ने अब कही, जुदी जुदी दशनाद ।
वही परापत को लहै, जो कोई साधै साध ॥
अष्टपदी ॥
पहिलि परीक्षा जान जु अनहद नादकी ।
सबै रोमावलि उठै जु वाके गातकी ॥
अरु दूजी जब सुनै नाद चित लावई ।
सब तन अंगन माहिं आलकस आवई ॥
तीजी अनहद नाद सुनै जितही जुटै ।
सब अंगन हियमाहि प्रेम पीड़ा उठै ॥
चौथि सुनै जब नाद परीक्षा पावई ।
तब शिर घूमनलगै अमल¹ ज्यों खावई ॥
पचवीं उठै जो नाद सुनै तामें पगै ।
वाके शीश सों जानि अमी² उतरन लगे ॥
छठा उठै जब नाद सुरति वामें धरै ।
कण्ठ सों नीचे उतरि अमी पीवन करै ॥
सतवीं खुलै जो नाद बिना श्रवणन सुनै ।
अन्तर्यामी होय लखै सबके मनै ॥
दूर दूर के वचन सुनै कोई कहै ।
होय परे की दृष्टि छिप्यो कछु ना रहै ॥
अठविं परीक्षा जानि परापत जो बनै ।
सब माहीं सबठौर नाद अनहद सुनै ॥
है सबही के मांझ बैन समझै सुनै ।
यह समझै अरु सुनै ताहि नीके गुनै ॥
नशा २ अमृत ॥