सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 174

हंसनादउपनिषद्वर्णन । १३६
गौरासों शिव कह्यो सांच करि जानिये ॥
दो० चरणदास ने अब कही, जुदी जुदी दशनाद ।
वही परापत को लहै, जो कोई साधै साध ॥
अष्टपदी ॥
पहिलि परीक्षा जान जु अनहद नादकी ।
सबै रोमावलि उठै जु वाके गातकी ॥
अरु दूजी जब सुनै नाद चित लावई ।
सब तन अंगन माहिं आलकस आवई ॥
तीजी अनहद नाद सुनै जितही जुटै ।
सब अंगन हियमाहि प्रेम पीड़ा उठै ॥
चौथि सुनै जब नाद परीक्षा पावई ।
तब शिर घूमनलगै अमल¹ ज्यों खावई ॥
पचवीं उठै जो नाद सुनै तामें पगै ।
वाके शीश सों जानि अमी² उतरन लगे ॥
छठा उठै जब नाद सुरति वामें धरै ।
कण्ठ सों नीचे उतरि अमी पीवन करै ॥
सतवीं खुलै जो नाद बिना श्रवणन सुनै ।
अन्तर्यामी होय लखै सबके मनै ॥
दूर दूर के वचन सुनै कोई कहै ।
होय परे की दृष्टि छिप्यो कछु ना रहै ॥
अठविं परीक्षा जानि परापत जो बनै ।
सब माहीं सबठौर नाद अनहद सुनै ॥
है सबही के मांझ बैन समझै सुनै ।
यह समझै अरु सुनै ताहि नीके गुनै ॥
नशा २ अमृत ॥