भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहंसनादउपनिषद्वर्णन । १३५
सो त्रिकुटी के मध्य तहां ठहराइये ॥
रोकै त्रिकुटी माहिं आनिके वायुको ।
षट्चक्र को भेदि चढ़ै जव धायको ॥
अपान वायु चढ़िजाय वहीं अस्थान है ।
प्रान वायु द्वै जाय साधु कोइ जान है ॥
रोकै प्रानहि वायु त्रिकुटी मध्यही ।
ओं का करै ध्यान शीश में मध्यही ॥
यह तौ ऊंचा ध्यान जु अधिक अनूपही ।
चरणाहदासा होय जु ब्रह्म स्वरूपही ॥
दो० नाम ब्रह्म का है नहीं, है तो ॐकार ।
जानै आपन को वही, मैं हौं तत्त्व अपार ॥
अष्टपदी ॥
अनहद शब्द अपार दूर सों दूर है ।
चेतन निर्मल शुद्ध देह भरपूर है ॥
ताहि निःअक्षर जानि और निष्कर्म है ।
परमातम तेहि मानि वही परब्रह्म है ॥
हृदय कमल के माहिं ध्यान सोहं करै ।
वाहि को अजपा जान सुरति मन लै धरै ॥
बिनहिं जपे जप होय- सुसांची बातही ।
सहस इक्कीस अरु छस्सौ जहां दिन रातही ॥
याको कीजै ध्यान होत है ब्रह्मही ।
धारै तेज अपार जाहि सब भ्रमही ॥
वा पटतर कोइ नाहिं जु योंहीं जानिये ।
चन्द सूर्य अरु सृष्टि के माहिं पिछानिये ॥
सो वह तेज अपार आपको मानिये ।
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