भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 171, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें१३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निश्चय अरु वहि सांच जु मनमें आनिये ॥
जब लग वाही भेद जो जाना था नहीं ।
जीवातम अरु हंस होरहा था तहीं ॥
जभी अगोचर१ भेद जु मनमाहीं लहा ।
परमातम परमहंस रूप निश्चय भया ॥
दो० जो जीवातम सो भया, परमातम अरु ब्रह्म ।
वाकी सरवर को करै, पाई परै न गम्य ॥
पहुँचै ना वा तेज को, कोटिकोटि ही भान ।
चरणदास कोइ जानहीं, ताको निर्मलज्ञान ॥
अष्टपदी ॥
परम ज्योति को प्राप्त सो नर होत है ।
जिन मन जीता होय लगाया गोत२ है ॥
जिन मन जीता नाहिं विषय आशा बहै ।
हृदय कमलदल आठ 'तहं फिरता रहै ॥
अष्ट पैंखरी जान जु आठौ अंगही ।
वही दिशा हैं आठ करै मन भंग ही ॥
'पंखरी पूरव दिशा जबै मन जात है ।
तब इच्छा हिय पुण्य करन की आत है ॥
अग्नेय दिशा है पैंखरी जब जावै मना ।
ऊंघ नींद अरु आलस जित आवै घना ॥
दक्षिणहिं जु दिशा पैंखरी राजई ।
उपजै बहुत किरोध कठोरता साजई ॥
दिशा जु नऋत पैंखरी पै मन रंगही ।
पाप करन की उपजै हिये तरंग ही ॥
१ न देखपड़ना २ बुड़ी ॥