भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वोपनिषद्वर्णन । १४७
सूझ ज्ञानप्रकाश सूं, जब गुरु मेटै आन्त१ ॥
रूप नाम किरियालगी, जबलग याके साथ ।
याहीते जी आतमा, कहलावै यह बात ॥
जैसे कञ्चन मृत्तिका, भांड़े किये संचार ।
नामरूप किरिया भई, देखो दृष्टि निहार ॥
रूपनाम किरिया मिटै, रहै न कछू विचार ।
जो था सोई रहगया, परमातम ततसार ॥
आतम अरु जीवात्मा, देह धरे से दोय ।
ताते बढ़ो उपाधही, मैं तू तू मैं होय ॥
तत्त्वम२सी जो यह कहा, ताको याहीं अर्थ ।
वह तूही हैं जानले, परम तत्त्व है सत्य ॥
अष्टपदी ॥
अरु वह ज्ञान स्वरूप अनन्द अनन्त है ।
उपजावन सब सृष्टि को जीवन कन्त है ॥
वस्तु काल अस्थान तीनों मिटि जातु है ।
वह एकरस सतरूप ब्रह्म रहिजातु है ॥
सब को जाननहार मिटै उपजै नहीं ।
तासूं कहैं वहि ज्ञान अर्थ जानो तहीं ॥
और कहैं जु अनन्त सो यासूं जानिये ।
सब भांड़े में इक माटी जु पिछानिये ॥
कनक के बरतन बहुत जु सोना एकिये ।
सब बसनन के माहिं जु सूतहि देखिये ॥
ऐसेहि आदिरु अन्त ब्रह्म सब माहिं है ।
कहिये याहि अनन्त भेद कछु नाहिं है ॥
१ हृदय का संदेह २ वेदान्त ॥