भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहंसनाथउपनिषद्वर्णन । १३१
अथ श्रीचरणदासकृत पंचउपनिषद्
अथर्वणवेद भाषा प्रथम
हंसनाथलिख्यते ॥
दो० बन्दत श्री शुकदेव को, उनको हिय में लाय ।
छिप्यो भेद परगट कियो, परमारथ के दाय ॥
संस्कृत भाषा करि, ताको यह दृष्टान्त ।
खोलि खोलि सबही कही, समझै छूटै भ्रान्त¹ ॥
ज्यों कूंएं सों नीर लै, बाहर दियो भराय ।
विना यतन कोई पियो, तिरषावन्त² अघाय ॥
पो दीन्ही शुकदेव ने, मैं जल काढ़नहार ।
प्यासा कोइ न जाइयो, टेरों वारंवार ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य जो, अरु शूद्रहु जो होय ।
वह पीवैगा हेत करि, बहु प्यासा जो कोय ॥
मुक्तिहु नीकी प्यास जो, काहूही को होय ।
और मनुष जग प्यास में, रहे जु मृतक होय ॥
यह जग ऐसो जानिये, मृगतृष्णा को नीर ।
निकट जाय प्यासा कोई, कभी न भागै पीर ॥
उनकी प्यास बुझै नहीं, होय नहा हिय चैन ।
ज्ञान सुधा तजि जात है, धोखे को जल लैन ॥
ज्ञान नीर तिरपत भये, निश्चल बैठे दास ।
संसारी प्यासे गये, पूरी भई न आस ॥
१ भ्रम २ पियासा ॥