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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

योगसन्देहसागर वर्णन । १०६
काया महलके जो तुम भेदी । ठौर ठौर कहु घटमें जेती ॥
पाँचंतत्त्व की इन्द्री दश । यही बतावो आगे बश ॥
चरणदासका गुरु शुकदेव । सोतौ जानै सबही भेद ॥
दो० चारदूध चौदह चौवारे, भेदी होय सो जानै ।
चरणदास शुकदेवका, बालक सो यह भेद बखानै ॥
छप्पय ॥
चंदकला कित छिपै बढ़ जब कितसों आवै ।
बादर कितसों होय फटै जब कहाँ समावै ॥
दीपलोय बुझिजाय जाय कित मोहिं बतावो ।
राति दिना कित जाय ध्रुवा केहि ठौर लखावो ॥
चरणदास शुकदेव सों पूँछतहौं शिरनाय के ।
तन छूटै जीजाय कित आवतहै किहि ठाँयते ॥
कवित्त ॥
देखो है तमाशा देह समझिकै विचारिलेहु, मूरुखनरहोय जो या बातमें हँसैगो ।
चीतेको मारि मृग नखशिख सुखायगयो, बाघनीको मारिवोकसिंहको ग्रसैगो ॥
बिल्लीको मारि चूहे प्रेमको नगारोदियो, दादुरहू पांच सर्प मारिकै बसैगो ।
कहै चरणदास ऐसे खेलसों लगाई आश, चिरिया के शीश तोरी बाजको लसैगो ॥
दो० पगलागूं शुकदेव के, और वारने जावं ।
गुप्तभेद मोसों कह्यो, सबवै नावं अरु ठावं ॥
सो तुमसों पूंछन करौं, हौं परषन के दाय ।
या सागर संदेह को, दीजै अर्थ बताय ॥
इति श्रीमन्महाराजसाहिबश्रीचरणदासकृतसंदेहसागरसंपूर्णम् ॥
०००००००००
१ पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश ॥

११० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ श्रीचरणदासकृतज्ञानस्वरोदय
प्रारम्भः ॥
दो० नमो नमो शुकदेव जी, परणम करौं अनन्त ।
तुम प्रसाद स्वरभेद को, चरणदास वर्णन्त ॥
ऽ पुरुषोत्तम परमातमा, पूरण बिस्वा बीश ।
ऽ आदिपुरुषअविचल तुहीं, तोहिं निवाऊं शीश ॥
कुं० ऽक्षर ॐ सों कहत हैं अक्षर सोहं जान ।
ऽ निहअक्षर श्वासा रहितहै ताहि को मन आन ॥
ऽ ताही को मन आन रात दिन सुरति लगावो ।
ऽ आपा आप विचारि औरना शीश नवावो ॥
ऽ चरणदास मथि कहतहैं अगम¹ निगम² की सीख ।
ऽ यही वचन ब्रह्मज्ञान का मानो बिस्वाबीस ॥
ॐ सूं काया भई सोहं सो मन होय ।
निहअक्षर श्वासा भई चरणदास भल जोय ॥
चरणदास भल जोय खेंचि मनवाँ तहं राखौ ।
क्षर अक्षर निहअक्षर एकै दुबिधा नाखौ ॥
ऽ जब दरशै एकही एक भेष यह सभी तिहारो ।
ऽ डार पात फल फूल मूल सो सभी निहारो ॥
श्वासा सों सोहं भयो सोहं ॐकार ।
ॐ सों रर्रा भयो साधो करो विचार ॥
ऽ साधो करो विचार उलटि घर अपने आवो ।
ऽ घट घट ब्रह्म अनूप सिमिरि करि तहाँ समावो ॥
१ पुराण २ वेद ॥

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १११
चारि वेद का भेद है, गीता का है जीव ।
चरणदास लखि आपको, तो मैं तेरा पीव ॥
दो० सब जोगन को जोग है, सब ज्ञानन को ज्ञान ।
सर्वसिद्धि को सिद्धि है, तत्त्व स्वरनको ध्यान ॥
ब्रह्मज्ञान को जाप है, अजपा सोहं साध ।
परमहंस कोइ जानि है, ताको मतो अगाध ॥
भेद स्वरोदय सो लहै, समझै श्वास उसास ।
बुरी भली तामें लखै, पवन सुरति मन गांस ॥
शुकदेव गुरू कृपा करी, दियो स्वरोदय ज्ञान ।
जब सों यह जानी परी, लाभ होय कै हान ॥
इड़ा^१ पिंगला^२ सुषमना^३, नाड़ी तीन विचार ।
दहिने बायें स्वरचलैं, लखै धारणा धार ॥
पिंगल दहिने अंग है, इड़ा सो बायें होय ।
सुषमन इनके बीच है, जब स्वर चालैं दोय ॥
जब स्वर चालैं पिंगला, तिहि मधि सूरज वास ।
इड़ा सो बायें अंग है, चन्द्र करत परकास ॥
उदय अस्त तिनकी लखै, निर्गम सुर्गम बिद्धि ।
और पावै तत बरणको, जब वह होवै सिद्धि ॥
शुकदेव कहिचरणदाससों, थिरचर स्वर पहिंचान ।
थिरकारज को चन्द्रमा, चरकारज को भान ॥
कृष्णपक्ष जबहीं लगै, जाय मिलत है भान ।
शुक्लपक्ष है चन्द्र को, यह निहचै करिजान ॥
मंगल अरु इतवार दिन, और शनीचर लीन ।


१ बाईं ओर की नाड़ी को कहते हैं २ दाहिनी ओर की नाड़ी को कहते हैं
३ दोनों के मध्य की नाड़ीको कहते हैं ॥

११२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुभकारज को मिलत हैं, सूरज के दिन तीन ॥
सोमवार शुकर भलो दिन, बृहस्पति को देखि ।
चंदजोग में सुफल हैं, कहैं चरणदास बीशेखि ॥
तिथिऔरवार विचारकरि, दहिनो बाऔं अंग ।
चरणदास कहै स्वर जो मिलै, शुभकारज परसंग ॥
कृष्णपक्ष के आदिहि, तीनि तिथ्य तक भान ।
फिरि चंदा फिरि भान है, फिरि चंदा फिरि भान ॥
शुक्लपक्ष के आदिही, तीनि तिथ्य लग चन्द ।
फिरि सूरज फिरि चन्द है, फिरिसूरज फिरि चन्द ॥
सूरजकी तिथि में चलै, जो सूरज परकास ।
सुख देही को करत हैं, लाहालाभ हुलास ॥
शुक्लपक्ष चन्दा चलै, परिवा लेहि निहार ।
फल आनंद मंगल करै, देही कूं सुखसार ॥
शुक्लपक्ष तिथि में चलै, जो परिवा को भान ।
होय क्लेश पीड़ा कछू, कै दुख कै कुछ हान ॥
सूरज की तिथि में चलै, जो परिवा को चन्द ।
कलह करै पीड़ा करै, हानि ताप कै द्वन्द ॥
ऊपर बायें सामने, स्वर बायें के संग ।
जो पूंछै शशि जोगमें, तौ नीको परसंग ॥
नीचे पीछे दाहिने, स्वर सूरज को राज ।
जो कोइ पूंछै आयकरि, तौ समझौ शुभकाज ॥
दहिनो स्वर जब चलत है, पूंछै बायें अंग ।
शुक्लपक्ष नहिं वार है, तौ निर्फल परसंग ॥
जो कोइ पूंछै आयकरि, बैठि दाहिनी ओर ।
चन्द चलै सूरज नहीं, नहिकारज बिधि कोर ॥

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । ११३
जो सूरज में स्वर चलै, कहै दाहिने आय ।
७ लग्नवार अरु तिथिमिलै, कहु कारज होइ जाय ॥
जो चन्दा में स्वर चलै, वायें पूंछै काज ।
तिथि अरु अक्षरवारमिलि, शुभकारज को साज ॥
७सात पांच नव तीन गिन, पन्द्रह ओर पचीश ।
काज बचन अक्षर गिनै, भानु जोग को ईश ॥
चार आठ द्वादश गिनै, चौदह सोलह मीत ।
चन्दजोग के संग हैं, चरणदास रणजीत ॥
कर्क मेष तुला मकर, चारौ चरती राश ।
सूरज सों चारौ मिलत, चरकारज परकाश ॥
मीन मिथुन कन्या कही, चौथी ओर धन मीत ।
'द्विस्वभाव' की सुषमना, मुरलीसूत रणजीत ॥
वृश्चिकसिंहवृषकुम्भ पुनि, बायें स्वरके संग ।
चन्द जोगको मिलत हैं, थिरकारज परसंग ॥
चित अपनो रिथर करै, नासा आगे नैन ।
श्वासा देखै दृष्टि सों, जब पावै स्वर बैन ॥
पांचघड़ी पांचो चलैं, फिरि वा चारहि बार ।
पांचतत्व चालै मिले, स्वरबिच लेह निहार ॥
धरती अरु आकाश है, और तीसरी पौन ।
पानी पावक पांच यों, करत श्वासमें गौन ॥
धरती तौ सोहीं चलै, अरु पीरौ रँग देख ।
बारह अंगुल श्वास में, सुरत निरतकर पेख ॥
ऊपर को पावक चलै, लाल बरण है भेष ।
चारि सु अंगुल श्वास में, चरणदास औ रेष ॥
नीचे को पानी चलै, श्वेत रंग है तासु ।

११४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सोलह अंगुल श्वास में, चरणदास कहै भासु ॥
हरो रंग है वायु को, तिरछी चालै सोय ।
आठ सुअंगुल श्वास में, रणजीत मीतकरिजोय ॥
स्वर दोनों पूरण चलैं, बाहर ना परकाश ।
श्याम रंग है तासु को, सोई तत्त्व आकाश ॥
जल पृथ्वी के जोग में, जो कोइ पूँछै बात ।
शशियर में जो स्वर चलै, कहु कारज होयजातं ॥
पावकऔर आकाश पुनि, वायु कभी जो होय ।
जो कोइ पूंछै आयकरि, शुभकारज नहिं होय ॥
जल पृथ्वी थिरकाज को, चरकारज को नाहिं ।
अग्नि वायु चरकाज को, दहिने स्वरके माहिं ॥
रोगी को पूंछै कोऊ, बैठि चन्द की ओर ।
धरती बायें स्वर चलै, मरै नहीं विधि क्रोर ॥
रोगी को परसंग जो, बायें पूँछै आन ।
चन्द बंध सूरज चलै, जीवै ना वह जान ॥
बहते स्वरसों आयकरि, शून्य ओर जो जाय ।
जो पूंछै परसंग वह, रोगी ना ठहराय ॥
शून्य ओर सों आयकर, पूंछै बहते श्वास ।
यह निश्चय करि जानिये, रोगी को नहिं नास ॥
शून्य ओर सों आय कै, पूंछै बहते पक्ष ।
जेते कारज जगत के, सुफल होयँ यों सब ॥
बहते स्वर से आय करि, जो पूंछै सुन और ।
जेते कारज जगत के, उलटे हों विधि क्रोर ॥
कै बायें कै दाहिने, जो कोइ पूरण होय ।
पूंछै पूरण होरही, कारज पूरण सोय ॥

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । '११५
बरस एक को फल कहै, तत मत जानै सोय ।
काल समौ सोई लखै, बुरो भलो जग होय ॥
संक्रायत पुनि मेष विचारै । तादिन लगै सु घड़ी निहारै ॥
तबहीं स्वर में करै विचारा । चलै कौन सो तत्त्व नियारा ॥
जो बायें स्वर पिरथी होई । नीको तत्त्व कहावै सोई ॥
देश वृद्धि अरु समै बतावै । परजा सुखी मेह बरसावै ॥
चारा बहुत ढोर को उपजै । नरदेही कों अन्न बहु निपजै ॥
जल चालै बायें स्वर माहीं । धरती फलै मेह बरसाहीं ॥
आनँद मंगल सों जग रहै । आपतत्त्व चन्दामें बहै ॥
जल धरती दोनों शुभ भाई । चरणदास शुकदेव बताई ॥
तीन तत्त्वका कहौं विचारा । स्वर में जाको भेद निहारा ॥
लगै मेष संक्रायत तबहीं । लगती घड़ी विचारै जबहीं ॥
अग्नितत्त्व स्वरमें जब चालै । रोग दोषमें परजा हालै ॥
काल पड़ै थोड़ोसो बरसै । देश भंग जो पावक दरसै ॥
वायु तत्त्व चालै स्वर संगा । जग भयमान होय कछु दंगा ॥
अर्द्ध काल थोड़ो सो बरसे । वायु तत्त्व जो स्वरमें दरसे ॥
तत्त्व आकाश स्वर चालै दोई । मेह न बरसै अन्न न होई ॥
काल पड़ै तृण¹ उपजै नाहीं । तत अकाश जोहो स्वर माहीं ॥
दो० चैत महीना मध्य में, जबहीं परिवा होय ।
शुक्लपक्ष ता दिन लगै, प्रातस्वास² में जोय ॥
भोरहि परिवा को लखै, पृथ्वी होय सुथांन ।
होय समौ परजा सुखी, राजा सुखी निदान ॥
नीर चलै जो चन्द में, यही समै की जीत ।
मेह बरसै परजा सुखी, संबत नीको मीत ॥
१ घास २ पहिला श्वासा ॥

११६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पृथ्वी पानी समौ जो, बहै चन्द अस्थान ।
'दहिने स्वर में जो बहै, समौ सु मध्यम जान ॥
भोरहिजो सुषमन चलै, राज होय उतपात ।
देखनवारो विनशहै, और काल पड़िजात ॥
राजहोय उतपात पुनि, पड़ै काल विसवास ।
मेह नहीं परजा दुखी, जो हो तत्त्व अकास ॥
श्वासा में पावक चलै, परै काल जब जान ।
रोग होय परजा दुखी, घटै राज को मान ॥
भय कलेश हो देश में, विग्रह फैलै अत्त ।
परै काल परजा दुखी, चलै वायु को तत्त ॥
संक्रायत अरु चैत को, दीन्हों भेद लखाय ।
जगतकाज अबकहतहूं, चन्द सूरको न्याय ॥
विवाहदान तीरथ जो करै । वस्तर भूषण घर पग धरै ॥
बायें स्वर में ये सब कीजै । पोथी पुस्तक जो लिखि लीजै ॥
'जोगाभ्यासरु कीजै प्रीत । औषधि बाड़ी कीजै मीत ॥
दिक्षा¹ मंतर बोवै नाज । चन्द्र जोग थिर बैठै राज ॥
चन्द्र जोग में स्थिर जानौ । थिर कारज सबही पहिंचानौ ॥
करै हवेली छप्पर छावै । बाग बगीचा गुफा² बनावै ॥
हाकिम जाय कोट में बरै । चन्द्र जोग आसन पग धरै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । चन्द्र जोग थिर काज कहावै ॥
दो० बायें स्वर के काज ये, सो मैं दिये बताय ।
दहिने स्वरके कहत हूं, ज्ञानस्वरोदय गाय ॥
जो खांड़ो कर लीयो चाहै । जाकर वैरी ऊपर बाहै ॥
युद्ध वाद रण जीतै सोई । दहिने स्वर में चालै कोई ॥
१ गुरुसे मंत्र लेना २ कन्दरा ॥

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । ११७
भोजन करै करै असनाना । मैथुन कर्म्म ध्यान परधाना ॥
वही लिखै कीजै व्यवहारा । गज घोड़ा वाहन हथियारा ॥
विद्या पढ़ै नई जो साधै । मंतर सिद्धि ध्यान आराधै ॥
वैरीभवन गवन जो कीजै । अरु काहूको ऋण जो दीजै ॥
ऋण काहूपै जो तू मांगै । विष अरु भूत उतारन लागै ॥
चरणदास शुकदेव विचारी । ये चरकर्म्म भानु की नारी ॥
दो० चरकारज को भानु है, थिरकारज को चन्द ।
सुषमन चलत न चालिये, तहां होय कछु दन्द ॥
गाँव परगने खेत पुनि, ईधर ऊधर भीत ।
सुषमन चलत न चालिये, बरजत है रणजीत ॥
क्षण बायें क्षण दाहिने, सोई सुषमन जानि ।
ढील लगै कै ना मिलै, कै कारज की हानि ॥
होय क्लेश पीड़ा कछू, जो कोई कहिं जाय ।
सुषमन चलत न चालिये, दीन्हों तोहिं बताय ॥
जोग करौ सुषमन चलै, कै आतम को ध्यान ।
और काज कोई करै, तौ कुछ आवै हान ॥
पूरव उत्तर मत चलै, बायें स्वर परकाश ।
हानि होय बहुरै नहीं, आवनकी नहिं आश ॥
दहिने चलत न चालिये, दक्षिण पश्चिम जानि ।
जोर जाय बहुरै नहीं, तहां होय कछु हानि ॥
दहिने स्वर में जाइये, पूरव उत्तर राज ।
सुख संपति आनँद करै, सभी होय शुभकाज ॥
बायें स्वर में जाइये, दक्षिण पश्चिम देश ।
सुख आनँद मंगल करै, जोर जाइ परदेश ॥
१ धन ॥

११८. श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दहिने सेती आय करि, बायें पूछै कोय ।
जो बावों स्वर बंध है, सुफलकाज नहिहोय ॥
बायें सेती आय करि, दहिने पूछै धाम ।
जो दहिनों स्वर बंध है, कारज अफल बताय ॥
जब स्वर भीतरको चलै, कारज पूछै कोय ।
पैज¹ बांधि वासों कहौ, मनसा पूरण होय ॥
जब स्वर बाहर कूं चलै, तब कोइ पूछै तोर ।
वाको ऐसे भाषिये, नहिंकाजविधिकरोर ॥
बाईं करवँट सोइये, जल बायें स्वर पीव ।
दहिने स्वर भोजन करै, तौ सुख पावै जीव ॥
बायें स्वर भोजन करै, दहिने पीवै नीर ।
दश दिन भूलो यों करै, आवै रोग शरीर ॥
दहिने स्वर झाड़े फिरै, बायें लघुशंकायं² ।
जुक्ती ऐसे साधिये, दीन्हों भेद बताय ॥
चन्द चलावै द्योस को, रात चलावै सूर ।
नित साधन ऐसे करै, होय उमर भरपूर ॥
जितनोहीं बावों चलै, सोई दहिनो होय ।
दशश्वासा सुषमनचलै, ताहि विचारौ लोय ॥
आठ पहर दहिनो चलै, बदलै नहीं जु पौन ।
तीन बरस काया रहै, जीव करै फिरि गौन ॥
सोलह पहर चलै जभी, श्वास पिंगला माहिं ।
जुगल बरष काया रहै, पीछे रहनो नाहिं ॥
तीनरात अरु तीनदिन, चलै दाहिनो श्वास ।
संवत भर काया रहै, पाछे फिर होवै नास ॥


१ प्रण २ पेशाब करना ॥

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । ११६
सोलहदिननिशिदिन चलै, श्वास भानु की ओर ।
आयु जान इकमासकी, जीव जाय तन छोर ॥
नौ भृकुटी ससै श्रवण, पांच तारका जान ।
तीन नाक जिह्वा इकैकै, काल भेद पहिंचान ॥
भेद गुरू सों पाइये, गुरु बिनु लहै न जान ।
चरणदास यों कहत है, गुरुपर वारौं प्रान ॥
एक मास जो रैनि दिन, भानु दाहिनो होय ।
चरणदास यों कहत है, नर जीवै दिन दोय ॥
नाड़ी जो सुषमन चलै, पांच घड़ी ठहराय ।
पांच घड़ी सुषमन बहै, तवहीं नर मरि जाय ॥
नहीं चन्द्र नहिं सूर है, नहीं सुषमना बाल ।
मुख सेती श्वासा चलै, घड़ी चार में काल ॥
चारि दिना कै आठ दिन, बारह कै दिन बीश ।
ऐसे जो चंदा चलै, आंव जान बड़ ईश ॥
तीन रात अरु तीन दिन, चालै तत्त्व अकाश ।
एक बरस काया रहै, फेर काल बिसवाश ॥
दिन को तौ चंदा चलै, चलै रात को सूर ।
यह निहंचै करि जानिये, प्राण गमन बहदूर ॥
रात चलै स्वर चन्द में, दिन को सूरज बाल ।
एक महीना यों चलै, छठे महीने काल॑ ॥
जब साधू ऐसी लखै, छठे महीने काल ।
आगे ही साधन करै, बैठि गुफा ततकाल ॥
ऊपर खैंचि अपान को, प्राण अपान मिलाय ।
उत्तम करै समाधि को, ताको काल न खाय ॥
१ मृत्यु ॥
१०

१२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पवन पियै ज्वाला पवै, नाभि तले करि राह ।
मेरुदण्ड¹ को फोरिकै, बसै अमरपुर जाय ॥
जहां काल पहुंचे नहीं, जम की होय न त्रास ।
गगनमण्डल²कोजायकरि, करै उनमनी वास ॥
जहां काल नहिंज्वालहै, छूटै सकल सन्तापँ ।
होय उनमनी लीनमन, बिसरै आपा आप ॥
तीनों बन्ध लगाय कै, पांच वायु को साध ।
सुषमन मारग है चलै, देखै खेल अगाध ॥
शक्ति जाय शिवसों मिले, जहां होय मन लीन ।
महा खेचरी जो लगे, जानै जान प्रवीन ॥
आसन पदम लगाय करि, मूलबन्ध को बांधि ।
मेरुदण्ड सीधो करै, सुरति गगन को साधि ॥
चन्द सूर दोउ सम करै, ठोढ़ी³ हिये लगाय ।
षट चक्कर को बेधिकरि, शून्य शिखर को जाय ॥
इड़ा पिंगला साधिकरि, सुषमन में करिवास ।
परमज्योतिझिलमिलतहां, पूजै मन विश्वास ॥
जिन साधन आगे करी, तासों सब कुछ होय ।
जब चाहै जबहीं तभी, काल बचावै सोय ॥
तरुणअवस्थाजोग करि, बैठि रहै मन जीत ।
काल बचावै साध वह, अन्त समय रणजीत ॥
सदा आप में लीन रहु, करिकै जोगाभ्यास ।
आवत देखै काल जब, गगनमण्डल कर वास ॥
शनै शनै साधि करि, राखै प्राण चढ़ाय ।
१ जो नाभि से लेकर मस्तक तक मिली हुई नाड़ी है २ आकाश ३
दाढ़ी का अर्द्धभाग ॥

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२१
पूरो जोगी जानिये, ताको काल न खाय ॥
पहिले साधन ना कियो, गगनमण्डल को जान ।
आवत जानै काल जब, कहा करै अज्ञान ॥
जोग ध्यान कीन्हों नहीं, ज्वान अवस्था मीत ।
आगम देखै काल को, कहा सकै वह जीत ॥
काल जीति हरिसोंमिलै, शून्य महल अस्थान ।
आगे जिन साधन करी, तरुण अवस्था जान ॥
काल अवधि बीतै तभी, जबै बीति सब जाय ।
जोगी प्राण उतारिये, लेहि समाधि जगाय ॥
काल जीति जगमें रहै, मौत न व्यापै ताहि ।
दशौद्वार को फोरिकै, जब चाहै जब जाहि ॥
सूरज मण्डल चीरिकै, जोगी त्यागै प्रान ।
सायुजं मुक्ति सोई लहै, पावै पद निर्वान ॥
कृष्णपक्ष के मध्य में, दक्षिण होय जु भान ।
जोगी वपुं नहिं छांडिये, राजा होय फिरि आन ॥
राज पाय हरिभक्तिकरि, पूरवली पहिचान ।
जोग जुक्ति पावै बहुरि, दूसर मुक्ति निदान ॥
उतरायण सूरज लखै, शुक्ल पक्ष के माहिं ।
जोगी काया त्यागिये, यामें संशय नाहिं ॥
मुक्ति होय बहुरै नहीं, जीव खोज मिटिजाय ।
बुन्द समुन्दर मिलिरहै, दुतिया ना ठहराय ॥
दक्षिणायन सूरज रहै, रहै मास षट जानि ।
फिर उतरायणजाय करि, रहै मास षट मानि ॥
दोनों स्वरको शुद्ध करि, श्वासा में मन राखि ।
१ दशौ इन्द्रिय २ परब्रह्ममें योजित होजाना ३ देह ॥

१२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भेद स्वरोदय पायकरि, तब काहू सों भाखि ॥
जो रण ऊपर जाइये, दहिने स्वर परकाश ।
जीति होय हारै नहीं, करै शत्रु को नाश ॥
दुर्जन को स्वर दाहिनो, तेरो दहिनो होय ।
जो कोई पहिले चढै, खेत जीति है सोय ॥
सुषमन चलत न चालिये, जुद्ध करन सुन मीत ।
शीश कटावै कै फँसै, दुर्जन की होय जीत ॥
जो बायें पृथ्वो चलै, चढ़ि आवै कोइ भूप ।
आप बैठि दल पेलिये, बात कहत हौं गूप ॥
जल पृथ्वी स्वर में चलै, सुनै कान दै वीर ।
सुफल काज दोनों करै, कै धरती कै नीर ॥
पावकअरु आकाश तत, वायु तत्त्व जो होहिं ।
कछू काज नहिं कीजिये, इन में बरजौं तोहिं ॥
दहिनों स्वर जब चलतहै, कहीं जाय जो कोय ।
तीन पाँव आगे धरै, सूरज को दिन होय ॥
बायें स्वर में जाइये, बायें पग धरि चार ।
बावों डग पहिले धरै, होय चन्द्र को बार ॥
दहिने स्वर में जो चले, दहिने डग धरि तीन ।
बायें स्वर में चारि डग, बावीं कर परबीन ॥
गर्भवती के गर्भ को, जो कोइ पूँछै आय ।
बालक होय कै बालकी, जीवै कै मरि जाय ॥
प्रद्यं १ बालक होनकी, जो कोउ पूँछै तोहिं ।
बायें कहिये छोकरी, दहिने बेटा होहिं ॥
दहिने स्वर के चलतही, जो वह पूँछै आय ।
१ प्रश्न ॥

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२३
वाको बावों स्वर चलै, बालक होय मरि जाय ॥
दहिने स्वर के चलतही, जो वह पूंछै वैन ।
वाहू को दहिनो चले, लरिका होय सुख चैन ॥
बायें स्वर के चलत ही, आय कहै जो कोय ।
बेटी होय जीवै नहीं, वाको दहिनो होय ॥
बायें स्वर के चलतही, जो वह पूंछै बात ।
वाहू को बावों चलै, बेटी होय कुशलात ॥
तत अकाश के चलतही, कहै गर्भ की आय ।
होय नपुंसक हींजड़ा, कै सतवांसो जाय ॥
लेन परीक्षा गर्भ की, जो कोई पूंछै आय ।
अग्नि होय जो तासमै, ओछाही गिरि जाय ॥
क्षण बायें क्षण दाहिने, दो स्वर सुषमन होय ।
पूंछन वारे सों कहौ, बालक उपजें दोय ॥
वायु तत्त्व के चलतही, जो कोउ पूंछै आय ।
छाया होय बाढ़े नहीं, पेटहि माहिं बिलाय ॥
जो कोई पूंछै आयकै, याको गर्भ कि नाहिं ।
दहिनों बावों स्वर लखै, साधि श्वास के माहिं ॥
बन्ध ओर जो आय करि, है पूंछै जो कोय ।
बन्ध ओर तौ गर्भ है, बहते स्वर नहिं होय ॥
इड़ा पिंगला सुषमना, नाड़ी कहिये तीन ।
सूरज चन्द विचारिकै, रहै श्वास लवलीन ॥
जैसेकछुआ सिमिटिकरि, आपी माहिं समाय ।
ऐसे ज्ञानी श्वास में, रहै सुरति लवलाय ॥
श्वास बाण बै क्रोड़ की, आव जान नरलोय ।
बीतजाय श्वासा जबै, तबहीं मृत्युक होय ॥

१२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
इक्कीस हजार छः सौ चलै, रात दिना जो श्वास ।
बीसा सौ जीवै बरष, होय अघन को नास ॥
अकाल मृत्यु कोई मरै, होय करि भुक्तै भूत ।
श्वास जहां बीतै सभी, जब आवै यमदूत ॥
चारौ संजम साधिकरि, श्वासा जुक्ति चलाय ।
अकाल मृत्यु आवै नहीं, जीवै पूरी आय ॥
सूक्ष्म भोजन कीजिये, रहिये ना पड़ि सोय ।
जल थोरो सो पीजिये, बहुत बोल मत खोय ॥
कुं० मोक्ष मुक्ति तुम चहत हौ तजौ कामना काम ।
मनकी इच्छा मेटिकरि भजो निरञ्जन नाम ॥
भजो निरञ्जन नाम तत्व देह अध्यास मिटावो ।
पञ्चन के तजि स्वाद आप में आप समावो ॥
जब छूटै झूठी देह जैसे के तैसे रहिया ।
चरणदास यहि मुक्ति गुरूने हमसों कहिया ॥
दो० देह मरै तू है अमर, पारब्रह्म है सोय ।
अज्ञानी भटकत फिरै, लखै सो ज्ञानी होय ॥
देह नहीं तू ब्रह्म है, अविनाशी निर्बान ।
नित न्यारो तू देह सों, देह कर्म सब जान ॥
डोलन बोलन सोवनो, भक्षण करन अहार ।
दुख सुख मैथुनरोग सब, गरमी शीत निहार ॥
जाति वरण कुल देहकी, सूरति मूरति नाम ।
उपजै विनशै देह सो, पांच तत्त्व को गाम ॥
पावक पानी वायु है, धरती और अकास ।
पांच तत्त्व के कोट में, आय कियो तैं वास ॥
पांच पचीसौ देह सँग, गुन तीनों हैं साथ ।

ज्ञानस्वरोदयवर्णन १२५
घट उपाधि सो जानिये, करत रहैं उतपाथ ॥
जिह्वा इन्द्री नीरकी, नभको इन्द्री कान ।
नासा इन्द्री धरणि की, करि विचार पहिंचान ॥
त्वचा सुइन्द्री वायु की, पावक इन्द्री नैन ।
इनको साधै साधु जो, पद पावै सुख चैन ॥
निद्रा संगम आलकस, भूख प्यास जो होय ।
चरणदास पांचौ कही, अग्नि तत्व सों जोय ॥
रक्त बिन्द कफ तीसरो, मेद मूत्र को जान ।
चरणदास परकिरत ये, पानी सों पहिंचान ॥
चाम हाड़ नाड़ी कहूं, रोम जान और मास ।
पृथ्वी की परकिरत ये, अन्त सबन को नास ॥
बल करना अरु धावना, उठना अरु संकोच ।
देह बढ़ै सो जानिये, वायु तत्त्व है शोच ॥
काम क्रोध मोह लोभ भै, तत अकाश कौ भाग ।
नभकी पांचौ जानिये, नित न्यारो तू जाग ॥
पांच पचीसौ एकही, इनके सकल स्वभाव ।
निर्विकार तू ब्रह्म है, आप आपको पाव ॥
निराकर निर्लिप्त · तू, देही जान अकार ।
आनि देही मान मत, यही ज्ञान ततसार ॥
शस्तर छेदि सकै नहीं, पावक सकै न जारि ।
मरै मिटै सो तू नहीं, गुरुगम भेद निहारि ॥
जलै कटै काया यही, बनै मिटै फिरि होय ।
जीवऽविनाशो नित्य है, जानै बिरला कोय ॥
आंख नाक जिह्वा कहूं, त्वचा जान अरु कान ।
पांचौ इन्द्री ज्ञान ये, जानै जान सुजान ॥

१२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुदा लिंग मुख तीसरो, हाथ पाँव लखि लेह ।
पांचौ इन्द्री कर्म हैं, यह भी कहिये देह ॥
पृथ्वी काल जो ठौर है, मुखै जानिये द्वार ।
पीलो रंग पहिंचानिये, पीवन खान अहार ॥
पित्ते में पावक रहै, नैन जानिये द्वार ।
लालरंग है अग्नि को, मोह लोभ आहार ॥
जल को बासा भाल है, लिंग जानिये द्वार ।
मैथुन कर्म अहार है, धौलो रंग निहार ॥
पवन नाभि में रहत है, नासा जानि दुआर ।
हरो रंग है वायु को, गन्ध सुगन्ध अहार ॥
अकाश शीश में वास है, श्रवण दुआरो जान ।
शब्द कुशब्द अहार है, ताको श्याम पिछान ॥
कारण सूक्ष्म लिंग है, अरु कहियत अस्थूल ।
शरीर तीन सों जानिये, मैं मेरी जड़ मूल ॥
चितबुद्धि मन अहंकार जो, अन्तःकरण सुधार ।
ज्ञान अग्नि सों जारिये, करिकरि मीत विचार ॥
शब्द सपरसरु गन्ध है, अरु कहियत रस रूप ।
देह कर्म्म तनमात्रा, तू कहियत निहरूप ॥
निराकार अद्वै अचल, निर्बासी तू जीव ।
निरालम्ब निर्वैर सो, अज अविनाशी सीव ॥
वावों कोठा अग्नि को, दहिने जल परकास ।
मन हिरदय अस्थान है, पवन नाभि में वास ॥
मूल कमल दल चारको, लाल पॅखरी रङ्ग ।
गौरीसुत वासो कियो, छह्यै जाप इकङ्ग ॥
पटदल कमल पियरे वरण, नाभी तले संभाल ।

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२७
षट सहस्र जपि जापले, ब्रह्म सावि¹त्री नाल ॥
दशम पंखरी कमल है, नील वरण सो नाम ।
विष्णुलक्षिमी वासकिनो, षट सहस्र पर जाप ॥
अनहृद चक्र हृदय रहै, द्वादश दलऔर श्वेतं ।
षट सहस्र जपि जापले, शिव शक्ती जहाँ हेत ॥
षोड़शदल को कमल है, कण्ठ वास शशि रूप ।
जाप सहस्र जहाँ जपै, भेद लहै अति गूप ॥
अग्नि चक्र दो दलकमल, त्रिकुटी धाम अनूप ।
जाप सहस्र जहां जपै, पावै ज्योति स्वरूप ॥
दल हजार को कमल है, गगन मण्डल में वास ।
जाप सहस्र जहां जपै, तेज पुंज परकास ॥
जोग जुक्तिकरि खोजिले, सुरत निरत करचीन ।
दश प्रकार अनहद बजै, होय जहाँ लवलीन ॥
कुं० एक भंवर गुंजारसी दूजे घुंघुरू होय ।
तीजे शब्द जु शंखका चौथे घण्टा सोय ॥
चौथे घण्टा सोय पाँचवें, ताल जु बाजै ।
छठे सुमुरली नाद सातवें भेरि जु गाजै ॥
अठवें शब्द मृदंग का नाद नफीरी नोय ।
दसवें गरजनि सिंहसी चरणदास सुनि लोय ॥
दो० दश प्रकार अनहद घुरै, तजत जोगी होय लीन ।
इन्द्री थकि मनुआँ थकै, चरणदास कहि दीन ॥
'तीन बन्ध नौनाटिकाँ२, दशवाईं को जान ।
प्राण अपान समान है, और कहिदेत उदान ॥
'व्यानवायुऔरकिरकिरा, कूरम बाई जीत ।
१ शारदा २ नाड़ी ॥

१२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
नाग धनंजय देवदत, दशवाईं रणजांत ॥
नवों द्वार को बन्ध करि, उत्तम नाड़ी तीन ।
इड़ा पिंगला सुषमना, केलि करैं परवीन ॥
करते प्राणायाम के, तिरगये पतित¹ अनेक ।
अनहद ध्वनि के बीचमें, देखै शब्द अलेख ॥
पूरक करि कुम्भक करै, रेचक पवन उतार ।
ऐसे प्राणायाम करि, सूक्ष्म करै अहार ॥
धरती बन्ध लगायकर, दशौ वायु को रोक ।
मस्तक प्राण चढ़ायकरि, करै अमरपुर भोग ॥
पांचौ मुद्रा साधि करि, पावै घट को भेद ।
नाड़ी शक्ति चढ़ाइये, षट चक्कर को छेद ॥
जोग जुक्तिकै कीजिये, कै अजपा को ध्यान ।
आपा आप विचारिये, परम तत्त्व को ज्ञान ॥
शूद्र वैश्य शरीर है, ब्राह्मण और राजपूत ।
बूढ़ा बाला तू नहीं, चरणदास औधूत ॥
काया माया जानिये, जीव ब्रह्म है मित्त ।
काया छुटि सूरत मिटे, तू परमातम नित्त ॥
पाप पुण्य आशा तजौ, तजौ मान और थाप ।
काया मोह विकार तजि, जपै सु अजपा जाप ॥
आप भुलानौ आपमें, बँधो आपही आप ।
जाको ढूंढ़त फिरत है, सो तू आपहि आप ॥
इच्छा दुई विसारिकर, होय न क्यों निर्वास ।
तूतौ जीवनमुक्त है, तजो मुक्ति की आस ॥
पवन भई आकाश सों, अग्नि वायुसों होय ।
१ पापी ॥