भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बहुरौ जन्म न होय परम आनँद लहै ॥
अब मैं वरणौं हंस और परमहंसही ।
जो समझे है ब्रह्म जाय सब संशही ॥
हंस हंस जो मंत्र अर्थ पहिचानिये ।
वह मैंहूँ यों कहै निश्चय करि जानिये ॥
यह मंतर सब माहिं सदाही भरि रह्यो ।
कोटिन में कोई जानि ध्यान सोइ धरि रह्यो ॥
जैसे काठ में आगि तिलों में तेल है ।
तैसे सब घटमाहिं इसी का मेल है ॥
दो० दूध मध्यज्यों घीव है, मेहँदी माहीं रंग ।
यतन बिना निकसनहीं, चरणदास सो ढंग ॥
जो जानै या भेदकौं, और करै परवेश ।
सो अविनाशी होत है, छूटै सकल कलेश ॥
अष्टपदी ॥
तन मथने को यतन कहूँ अब जानिये ।
ज्यों निकसै ततसार विलोवन ठानिये ॥
पहिले चक्र जानि मूल द्वारे बिषे ।
जितही पाँव की एँडी सूं बन्ध दे रखे ॥
मूल चक्रसों खैंचि अपान चलाइये ।
दूजे चक्र पास जु आनि फिराइये ॥
दहिनी ओरसों तीनि लपेटे दीजिये ।
तीजे चक्र माहिं गमन फिरि कीजिये ॥
चौथे चक्र माहिं पवन जो लाइये ।
बहुरौ पाँचवें चक्र में जू पहुंचाइये ॥
षष्ठम चक्र माहिं जु तांहि चढ़ाइये।