भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२६
पावक सों पानी भयों, पानी धरती सोय ॥
धरती मीठे स्वाद है, खारी स्वाद सुनीर ।
अग्नि चरपरो स्वाद है, खट्टो स्वाद समीर ॥
खट्टा मीठा चरपरा, खारी पर मन होय ।
जबहीं तत्त्व विचारिये, पांच तत्त्व में कोय ॥
स्वाद नाप ओर रंग है, और बताई चाल ।
पांच तत्त्वकी परख यह, साधि पाव ततकाल ॥
तिरकोनी पावक चले, धरती तौ चौकोर ।
शून्यस्वभाव अकाशको, पानी लांबो गोल ॥
अग्नि तत्त्व गुण तामसी, कही रजोगुण बाय ।
पृथ्वी नीर सतोगुणी, नभ है अस्थिर¹ भाय ॥
नीर चलै जब श्वास में, रण ऊपर चढ़ि मीत ।
वैरी को शिर काटकरि, घर आवै रणजीत ॥
पृथ्वी के परकास में, युद्ध करै जो कोय ।
दोउ दल रहैं बराबरी, हारि वायु मैं होय ॥
अग्नि तत्त्वके बहतही, युद्ध करन मति जाव ।
हारि होय जीतै नहीं, अरु आवै तन घाव ॥
तत अकाश में जो चलै, तौ ठाईं रहिजाय ।
रणमाहीं काया छुटै, घर नहिं देखै आय ॥
जल पृथ्वी के जोग में, गर्भ रहै सो पूत ।
वायु तत्त्व में छोकरी², आंबर सूतक सूत ॥
पृथ्वी तत्व में गर्भ जो, बालक होवे भूप ।
धनवन्ता सोइ जानिये, सुन्दर होय स्वरूप ॥
अग्नि तत्त्व जब चलत है, कभी गरभ रहिजाय ।
१ न चलसकै २ लड़की ॥