भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 181, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें:१४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अरु यह सूक्ष्म शरीर आतमा साथ' जो ।
ताते भासतं सत्य सत्य है बात सो ॥-
जब आतम पहिंचान हिये में आवई ।
तब सूक्ष्म को सांच सबै उठि जावई ॥
दो० सूक्ष्म शरीररु आतमा, भिन्न लखै नहिं कोय ।
यही जु मन की गांठ है, खुले मुक्ति ही होय ॥
जाने जाननहारही, और तीसरी जान ।
इन तीनों को जो लखै, सो साक्षी परधान२ ॥
उपजै तीनों द्वैत सों, मिटै एकता होय ।
उपजन मिटना तीनका, जानै न्यारा सोय ॥
अपनेही परकाश में, आप रहा परकास ।
सोई साक्षी जानिये, कहै चरणहीं दास ॥
यद्यपि बन्धन में बँधा, कहै जु निर्बंध दूर ।
चींटी ब्रह्मा आदिलौं, हिरदय में भरपूर ॥
सबही हिरदय के मिटे, वही एक ठहराय ।
ना कुछ आया ना गया, ज्योंका त्यों रहिजाय॥
बन्धन में आवै सही, लीला करन दयाल ।
निरबंधैं का निरबंध रहै, अजअबिनाशिअकाल॥
अंतर्यामी के अरथ, सब घट रहो समाय ।
जैसे डोरेके विषे, भांतिभांति मणिकाया॥
सबही के भीतर बसै, सबका जाननहार ।
वाहीते परगट भई, नाना वस्तु अपार ॥
घनेरूप किरिया घनी, घनेनाम दृष्टान्त५ ।
१ दिखात २ मुख्य 'जाननेवाला ३ जो बँधा हुआ न हो ४ मणि
समूह ५ मिसाल ॥