भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
गर्भ गिरे माता दुखी, हो माता मरि जाय ॥
वायु तत्त्व स्वर दाहिने, करै पुरुष जब भोग ।
गर्भ रहै जो तासमै, देही आवै रोग ॥
आसन संयम साधिकरि, दृष्टि श्वास के माहिं ।
तत्त्व भेद यों पाइये, बिन साधे कुछ नाहिं ॥
आसन पदम लगायकै, एक बरत नित साध ।
बैठे लेटे डोलते, श्वासाही आराध ॥
नाभि नासिकामाहिंकरि, सोहं सोहं जाप ।
सोई अजपा जाप है, छुटै पुण्य अरु पाप ॥
भेद स्वरोदय बहुत है, सूक्ष्म कह्यो बनाय ।
ताको समझिबिचारिले, अपनो चित मनलाय ॥
धरणि टरै गिरिवर टरै, ध्रुव टरै सुन मीत ।
वचन स्वरोदय ना टरै, कहै दास रणजीत ॥
शुकदेव गुरूकी दया सों, साधु दया सों जान ।
चरणदास रणजीत ने, कह्यो स्वरोदय ज्ञान ॥
छप्पै—डहरे में मेरो जनम नाम रणजीत पिछानो ।
मुरली को सुत जान जात दूसरि पहिंचानो ॥
बाल अवस्था माहिं बहुरि दिल्ली में आयो ।
रमत मिले शुकदेव नाम चरणदास धरायो ॥
जोग जुक्ति हरि भक्तिकरि ब्रह्मज्ञान दृढ़करि गह्यो ।
आतम तत्त्वविचारिकैअजपा में मन सनिरह्यो ॥
इति श्रीचरणदासजीकृतज्ञानस्वरोदयसंपूर्णम्