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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 690 में से

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पृष्ठ 178

सर्वोपनिषद् वर्णन । १४३
जीव जु अन्तःकरणके, चारौ देवत संग ।
सूक्ष्म देही साथही, देखै स्वप्ना रंग ॥
चौदहही सब लीनहै, जीव आतमा माहिं ।
यही सुषुप्ति जानिये, कछु भी सूझै नाहिं ॥
अष्टपदी ॥
तीन अवस्था मिटैं मिटैऽहंकार है ।
तुरियाही रहिजाय जु तत्व अपार है ॥
परमातम जो पुरुष सदा निर्लेव है ।
केवल ज्ञान स्वरूप जु ब्रह्म अभेव¹ है ॥
अब कोठों की बात कहूं चितदीजिये ।
जुदा जुदा विस्तार सबै सुनिलीजिये ॥
पहला कोठा कहूँ अन्नसेती भरो ।
छह कोठे तेहि माहिं सोई श्रवणन धरो ॥
तीन पिताकी ओर सो लाया संगही ।
बीरज मींगी हाड़ सफ़ेद जु रंगही ॥
अब माता के अंश तीनिहीं जानिये ।
लोह त्वचा अरु मांस अरुण पहिचानिये ॥
प्रानसे कोठा भरा दशौ जहां वायु है ।
अगले भी छः कहे जु रहे समाय है ॥
तीजा कोठा जानि धरो तहँ शुद्धिही ।
मन चित अरु अहंकार भरी जहँ बुद्धिही ॥
चौथा कोठा देख इन्हीं का जानना ।
तामें भरो है ज्ञान सभी को पिछानना ॥
पाँचवाँ कोठा जानि जो आनंद सों भरा ।
१ जो न जानाजाय ॥