भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 167, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
संस्कृत था कूप सम, भाषा नीर निकास ।
प्याऊं जिज्ञासून को, तिनकीं भगै पियास ॥
अष्टपदी ॥
वेदहि की उपनिषद् जु मैं भाषा करी ।
जो कुछ था वहिमाहिं सोई जैसे धरी ॥
सुनि समझै मन माहिं, और करनी करै ।
आवागमन मिटाय नहीं देही धरै ॥
जगकी व्याधा¹ छूटि मुक्तिपद पावई ।
जाग्रत पहुँचे ठौर स्वप्न बिसरावई ॥
तिमिर² सभी भजिजाय उजारा होय है ।
सूझै आतम रूप द्वैँतता खोय है ॥
उपजै अति आनन्द द्वन्द दुख जाय है ।
तिरंपति निर्मलज्ञान विज्ञान अघाय है ॥
जोपै करै विचार और गुरुसों लहै ।
वाकी गहनी गहै और रहनी रहै ॥
गुरु शुकदेव प्रताप सो चितते गाइया ।
चरणहिदासा होय सबन शिर नाइया ॥
दो० पूजे ऋषि मुनि देवता, पूजे इन्द्रहु भूप ।
पूजा सबही इष्ट को, देखा हरि के रूप ॥
सर्वत्रहि प्रभु देखिकरि, सबको शीश नवाय ।
उपनिषदैं जो वेद की, परगट कहीं बनाय ॥
अष्टपदी ॥
प्रथम प्रगट करी छिपेही भेदकी ।
हंस नामऽहंनाम अथर्वणवेद की ॥
१ दुःख २ अन्धकार ॥