भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें१४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जैसे सगरो वृक्ष बीजमाहीं धर्रा ॥
दो० चारौ कोठे जो कहे, अरु कारण को देखि ।
जहाँ सभी ये रहत हैं, वा ठौरी को पेखि ॥
वा ठौरी को जानिये, ज्यों तरुवर को बीज ।
डाल पात फल फूलही, रहै जु वाके बीच ॥
ऐसे वाको समझिकै, रहै जु आनँद आहि ।
आनँदही आनँद भरा, पाँचवें कोठे मांहि ॥
अष्टपदी ॥
आतम करता जानु जु जामें बुधि रहै ।
दुख सुख वाही माहिं सभी आशा गहै ॥
इच्छा पूरी भये होत मन मोद¹ है ।
जब पूरी नहिं होय घना दुख होत है ॥
दुख सुख दोनों होत जो पांचन के बिषे ।
सो वे इन्द्री जान बिना इनके कसे ॥
सरवन² सों सुनि शब्द बुरा भल को यही ।
और त्वचा सों जान सपँर्श³ कि होयही ॥
आंखन सों लखि होय जु रूप कुरूपसों ।
अरु जिह्वा सो होय जु षटरँस स्वाद सों ॥
नासासेती होय बुरी भलि गंध ले ।
इनसे उतपति होय जु दुख सुख भै अभै ॥
आतम को जीवातम इस कारण कहैं ।
सूक्ष्म⁵ अरु अस्थूल⁶ देह संगही रहैं ॥
बुरे भले जो करमन के फल में बँधा ।
१ आनन्द २ कान ३ छूना ४ खट्ठाखारी मीठा करुवा चरफरा कपैल
५ हलका ६ मोटा ॥