भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
देह को साक्षी कहै सो कौन विचार है ॥
दो० ऐसो यह बन्धन बँधो, कहैं तज्ञ निर्बन्ध ।
अन्तर्यामी क्यों कहैं, मोहिं बताओ सन्ध ॥
आतमहीं को क्यों कहैं, जीव आतमा मान ।
माया यासों कहत हैं, दूरि करो अज्ञान ॥
अष्टपदी ॥
परजापति सब सुनिकै यह उत्तर दिया ।
आतमहीं का ज्ञान सभी परगट किया ॥
जीव आतमा देह मानिकै मैं कहैं ।
ताते परो अज्ञान सबै दुख सुख सहैं ॥
आपको लम्बाजान कि ठिंगना१ जानई ।
कबहूँ दुबला जान कि मोटा मानई ॥
आपको जानै वृद्ध कि बालक तरुन२ है ।
जानत नारी पुरुष जु मानत बरन है ॥
देह संग ह्वै देह करै जु विहार है ।
आपन कोगयो भूलि रहै न विचार है ॥
वाको बन्धन यही सुनो चितमें धरो ।
देह भाव छुटिजाय मुक्ति निश्चय करो ॥
जाही वस्तु सों उपजै तन अभिमान है ।
वही अविद्या जान वही अज्ञान है ॥
यही भरम उठिजाय जिसी जु विचार सों ।
वाही विद्या जानि वही कों ज्ञानहूँ ॥
दो० चौदह इन्द्री देवता, मिलि जो करैं व्योहार ।
चरणदास यों कहत हैं, जाग्रत यही निहार ॥
१ छोटा २ ज्वान ॥