भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० खुलै नवां जब नादहीं, लक्षण यह पहिंचान ।
सूक्ष्म होय जित तित गमन, करै धरै जो ध्यान ॥
काहू हीकी दृष्टि सों, चहै अगोचर होन ।
होय सकै दीखै नहीं, वह सब देखै जोन ॥
जैसे सुर सबको लखैं, उन्हें न देखै कोय ।
रणजित कहै अस्थूलहो, चाहे सूक्ष्म होय ॥
अष्टपदी ॥
दंशवीं खुलै जो नाद परे सोहंपरे ।
पारब्रह्म होइजाय ध्यान ताको करै ॥
ध्यानी को मन लीन होय अनहद सुनै ।
'आप अनाहद होय वासना १ सब भुनै ॥
पाप पुण्य छुटिजाय दोऊ फल ना रहें ।
होय परमकल्याण जु त्रैगुण २ ना गहैं ॥
होवै बोध स्वरूप तेज ह्वै जात है ।
अटक रहै नहिं कोय सबै ठां समात है ॥
अज अविनाशी शुद्ध पवित्र सत्तही ।
होवै आनँदरूप परम जो तत्त्वही ॥
'निर्विकार निर्लेप और निर्बानहीं ।
आनंद सबको देत आपको जानहीं ॥
या ध्यानी को नाम जु ॐकार है ।
सब नामनमें बड़ा किया जु विचार है ॥
'याको ऐसे मानै कि वह जो मैंहीं हूँ ।
रूप नाम गुण जान कि यह सब वाहीसूं ॥
दो० करतै अनहद ध्यानही, ब्रह्मरूप ह्वै जाय ।
१ मनकी इच्छा २ सत् रज तम ॥