सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 175

१४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० खुलै नवां जब नादहीं, लक्षण यह पहिंचान ।
सूक्ष्म होय जित तित गमन, करै धरै जो ध्यान ॥
काहू हीकी दृष्टि सों, चहै अगोचर होन ।
होय सकै दीखै नहीं, वह सब देखै जोन ॥
जैसे सुर सबको लखैं, उन्हें न देखै कोय ।
रणजित कहै अस्थूलहो, चाहे सूक्ष्म होय ॥
अष्टपदी ॥
दंशवीं खुलै जो नाद परे सोहंपरे ।
पारब्रह्म होइजाय ध्यान ताको करै ॥
ध्यानी को मन लीन होय अनहद सुनै ।
'आप अनाहद होय वासना १ सब भुनै ॥
पाप पुण्य छुटिजाय दोऊ फल ना रहें ।
होय परमकल्याण जु त्रैगुण २ ना गहैं ॥
होवै बोध स्वरूप तेज ह्वै जात है ।
अटक रहै नहिं कोय सबै ठां समात है ॥
अज अविनाशी शुद्ध पवित्र सत्तही ।
होवै आनँदरूप परम जो तत्त्वही ॥
'निर्विकार निर्लेप और निर्बानहीं ।
आनंद सबको देत आपको जानहीं ॥
या ध्यानी को नाम जु ॐकार है ।
सब नामनमें बड़ा किया जु विचार है ॥
'याको ऐसे मानै कि वह जो मैंहीं हूँ ।
रूप नाम गुण जान कि यह सब वाहीसूं ॥
दो० करतै अनहद ध्यानही, ब्रह्मरूप ह्वै जाय ।
१ मनकी इच्छा २ सत् रज तम ॥