भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहंसनादूउपनिषद्वर्णन । १३३
गौतमऋषि करि चाव ऋषीश्वर पै गये ।
संत सुजातजु नाम बहुत आदर किये ॥
गौतम स्तुति करी बहुतही प्रीति सों ।
फिरि पूंछी यह बात जु लघुता रीति सों ॥
परमेश्वर पहिंचान मोहि समुझाइये ।
मुक्तहोन के पन्थ सबै जु दिखाइये ॥
ह्वैकर बहुत प्रसन्न* ऋषीश्वर बोलिया ।
गौरा अरु महादेव की चरचा खोलिया ॥
सब देवन के देव महादेव हैं सही ।
उपनिषदें जो वेद कि गौरा सों कही ॥
सो मैं तुमसों कहौं प्रीति के भाव सों ।
तुमहूं नीके सुनौ अधिकही चाव सों ॥
गुप्त महा यह भेद हिये में राखिये ।
जो जड़ मूरख होय तासु नहिं भाखिये ॥
दो० हरिभक्ता अरु गुरुमुखी, तप करने की आस ।
सतसंगी सांचा यती१, ताहि देहु चरनदास ॥
अष्टपदी ॥
अब मैं कहौं संभाल सुरत ह्वां दीजिये ।
यह तौ अचरज कथा श्रवण सुनि लीजिये ॥
यही श्वास कहि हंस आय अरु जाय है ।
पूरा सतगुरु मिलै तौ भेद लखाय है ॥
जो कोउ याको समझि करै अरु ध्यानहीं ।
ऋद्धि सिद्धि सुखहोहिं जु उपजै ज्ञानहीं ॥
अन्त मुक्तिही होय अभैपद में रहै ।
१ योगी ॥