सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 180

सर्वोपनिषद्वर्णन । १४५
बीचहि लिया लगाय नहीं धुरसों फँधा ॥
ज्यों कञ्चन के संग जु टांका जानिये ।
१धौले बस्तर साथ जु मैल पिछानिये ॥
शोधे से है दूर शुद्ध है जात है।
अपनेहिं अङ्गन आय जु श्वेत दिखात है ॥
जीवातम इहि भांति फलन त्यागन करै ।
आतमहीं रहिजाय जीवता ना रहै ॥
खोटे कर्म जु त्यागि भले सहजै करै ।
तिनका फल जो होय नहीं आशा धरै ॥
दौ० जीव ब्रह्म यों होत है, रहै न कछू लगाव ।
चरणदास यों कहत हैं ऐसा किये उपाव ॥
अष्टपदी ॥
देह को जाननहारा ऐसे मानई ।
सूक्ष्म अरु अस्थूल को अपनी जानई ॥
कबहुँ कहै मम शीश आंख मुख हाथ है ।
कभी बतावै पांव कहै मेरा गात है ॥
मन बुद्धि चित-अहङ्कार समझ ये चार हैं ।
अरु पांचों है वायु जु कोइ निहार है ॥
प्राण अपानहि व्यान उदान समान हैं ।
सात्त्विक राजस तामस तीनों जानि हैं ॥
वैर प्रीति अरु तीसरि इनकी द्वूँद्व है ।
चौथा मनोरथ तौनिक सब मिलि झुंड है ॥
भले बुरे जो कर्म और मन आनिये ।
सूक्ष्म शरीर को मूल ये सब पहिचानिये ॥
१ सफेद ॥