भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें˙हंसनादू उपनिषद् वर्णन । १४१
चरणदास यों कहत है, वाधा सब मिटिजाय ॥
˙इति हंसनाद् उपनिषद् सम्पूर्णम् ॥
अथ सर्वोपनिषद् द्वितीय प्रारंभः ॥
दो० दूसरि जो उपनिषद है, ताको कहौं बनाय ।
सर्व नाम तिहि जानिये, ताहि देहुँ प्रकटाय१ ॥
अष्टपदी ॥
परजापति२ के शिष्य जो पूँछी आयकै ।
वन्ध मुक्ति का भेद देहु समझायकै ॥
काहि कहत हैं वन्ध मोक्ष कासों कहैं ।
विद्याऽविद्या३ भेद कहौ कैसे लहैं ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति मोहिं बतलाइये ।
अरु तुरिया को भेद सभी जु सुनाइये ॥
कोठे पांच को भेद गुरू वर्णन करो ।
जुदा जुदा समझाय तिमिर४ दुबिधा हरो ॥
पहिल अन्न सों भरा दुजा भरा प्रान सों ।
तीजा मन सों भरा चौथ बुद्धि रानिस ॥
पँचवाँ आनँद भरा मोहिं कहि दीजिये ।
हौं तौ चरणहिंदास कृपा जो कीजिये ॥
आतम को जो अकर्ता कैसे कै कहैं ।
किन अनर्थ सों जीव जु याही को ठहैं ॥
अरु कहैं याको देहका जाननहार. है ।
१ जाहिर करना २ ब्रह्मा ३ माया ४ अँधियारा ॥