भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 173, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें. १३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी ॥
कैसे अनहद उठै हिये अस्थान सों ।
यह जीवातम सुनै हृदय बल ध्यान सों ॥
दश प्रकार के नाद कहूं भिन्न भिन्नही ।
सो उपनिषदहि माहिं कहे सब चिह्नही ॥
पहली ऐसे होय चिड़िया ज्यों चीला ।
एकबार कहै चिह्न सुनौ सोई सुरंतला ॥
ऐसेही दोबारा जु दूजी जानिये ।
चिह्न चिह्नही होत ताहि पहिचानिये ॥
क्षुद्रघंटिका तीसरि चौथी शंख ज्यों ।
पंचम ऐसी जान बजत है बीन त्यों ॥
छठीं बजै ज्यों ताल सातवीं बाँसुरी ।
अठवें शब्द मृदङ्ग लगै मन गाँसुरी ॥
नवें नफीरी नाद जु दशवें सिद्धि है ।
बादर कीसी गरज ददह दहंद है ॥
करते में अभ्यास जु नाद सब खुलैं ।
जैसे बटाऊ १ चलत नगर नौ मग मिलैं ॥
दशवें पहुँचे जाय नवें बिसराइया ।
रहत किया वा देश जहां घर छाइया ॥
ऐसेही नौ छोड़ नाद दशवां गहै ।
बादल कीसी गर्ज जहां मन दे रहै ॥
वाकों छोड़ै नाहिं सदा रहै लीनहीं ।
यही जु अनहद सार जानि परबीनहीं ॥
याको प्राप्त कहूं जो मन में आनिये ।
१ रोस्ता चलनेवाला ॥