भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
११६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पृथ्वी पानी समौ जो, बहै चन्द अस्थान ।
'दहिने स्वर में जो बहै, समौ सु मध्यम जान ॥
भोरहिजो सुषमन चलै, राज होय उतपात ।
देखनवारो विनशहै, और काल पड़िजात ॥
राजहोय उतपात पुनि, पड़ै काल विसवास ।
मेह नहीं परजा दुखी, जो हो तत्त्व अकास ॥
श्वासा में पावक चलै, परै काल जब जान ।
रोग होय परजा दुखी, घटै राज को मान ॥
भय कलेश हो देश में, विग्रह फैलै अत्त ।
परै काल परजा दुखी, चलै वायु को तत्त ॥
संक्रायत अरु चैत को, दीन्हों भेद लखाय ।
जगतकाज अबकहतहूं, चन्द सूरको न्याय ॥
विवाहदान तीरथ जो करै । वस्तर भूषण घर पग धरै ॥
बायें स्वर में ये सब कीजै । पोथी पुस्तक जो लिखि लीजै ॥
'जोगाभ्यासरु कीजै प्रीत । औषधि बाड़ी कीजै मीत ॥
दिक्षा¹ मंतर बोवै नाज । चन्द्र जोग थिर बैठै राज ॥
चन्द्र जोग में स्थिर जानौ । थिर कारज सबही पहिंचानौ ॥
करै हवेली छप्पर छावै । बाग बगीचा गुफा² बनावै ॥
हाकिम जाय कोट में बरै । चन्द्र जोग आसन पग धरै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । चन्द्र जोग थिर काज कहावै ॥
दो० बायें स्वर के काज ये, सो मैं दिये बताय ।
दहिने स्वरके कहत हूं, ज्ञानस्वरोदय गाय ॥
जो खांड़ो कर लीयो चाहै । जाकर वैरी ऊपर बाहै ॥
युद्ध वाद रण जीतै सोई । दहिने स्वर में चालै कोई ॥
१ गुरुसे मंत्र लेना २ कन्दरा ॥
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । ११७
भोजन करै करै असनाना । मैथुन कर्म्म ध्यान परधाना ॥
वही लिखै कीजै व्यवहारा । गज घोड़ा वाहन हथियारा ॥
विद्या पढ़ै नई जो साधै । मंतर सिद्धि ध्यान आराधै ॥
वैरीभवन गवन जो कीजै । अरु काहूको ऋण जो दीजै ॥
ऋण काहूपै जो तू मांगै । विष अरु भूत उतारन लागै ॥
चरणदास शुकदेव विचारी । ये चरकर्म्म भानु की नारी ॥
दो० चरकारज को भानु है, थिरकारज को चन्द ।
सुषमन चलत न चालिये, तहां होय कछु दन्द ॥
गाँव परगने खेत पुनि, ईधर ऊधर भीत ।
सुषमन चलत न चालिये, बरजत है रणजीत ॥
क्षण बायें क्षण दाहिने, सोई सुषमन जानि ।
ढील लगै कै ना मिलै, कै कारज की हानि ॥
होय क्लेश पीड़ा कछू, जो कोई कहिं जाय ।
सुषमन चलत न चालिये, दीन्हों तोहिं बताय ॥
जोग करौ सुषमन चलै, कै आतम को ध्यान ।
और काज कोई करै, तौ कुछ आवै हान ॥
पूरव उत्तर मत चलै, बायें स्वर परकाश ।
हानि होय बहुरै नहीं, आवनकी नहिं आश ॥
दहिने चलत न चालिये, दक्षिण पश्चिम जानि ।
जोर जाय बहुरै नहीं, तहां होय कछु हानि ॥
दहिने स्वर में जाइये, पूरव उत्तर राज ।
सुख संपति आनँद करै, सभी होय शुभकाज ॥
बायें स्वर में जाइये, दक्षिण पश्चिम देश ।
सुख आनँद मंगल करै, जोर जाइ परदेश ॥
१ धन ॥
११८. श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दहिने सेती आय करि, बायें पूछै कोय ।
जो बावों स्वर बंध है, सुफलकाज नहिहोय ॥
बायें सेती आय करि, दहिने पूछै धाम ।
जो दहिनों स्वर बंध है, कारज अफल बताय ॥
जब स्वर भीतरको चलै, कारज पूछै कोय ।
पैज¹ बांधि वासों कहौ, मनसा पूरण होय ॥
जब स्वर बाहर कूं चलै, तब कोइ पूछै तोर ।
वाको ऐसे भाषिये, नहिंकाजविधिकरोर ॥
बाईं करवँट सोइये, जल बायें स्वर पीव ।
दहिने स्वर भोजन करै, तौ सुख पावै जीव ॥
बायें स्वर भोजन करै, दहिने पीवै नीर ।
दश दिन भूलो यों करै, आवै रोग शरीर ॥
दहिने स्वर झाड़े फिरै, बायें लघुशंकायं² ।
जुक्ती ऐसे साधिये, दीन्हों भेद बताय ॥
चन्द चलावै द्योस को, रात चलावै सूर ।
नित साधन ऐसे करै, होय उमर भरपूर ॥
जितनोहीं बावों चलै, सोई दहिनो होय ।
दशश्वासा सुषमनचलै, ताहि विचारौ लोय ॥
आठ पहर दहिनो चलै, बदलै नहीं जु पौन ।
तीन बरस काया रहै, जीव करै फिरि गौन ॥
सोलह पहर चलै जभी, श्वास पिंगला माहिं ।
जुगल बरष काया रहै, पीछे रहनो नाहिं ॥
तीनरात अरु तीनदिन, चलै दाहिनो श्वास ।
संवत भर काया रहै, पाछे फिर होवै नास ॥
१ प्रण २ पेशाब करना ॥
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । ११६
सोलहदिननिशिदिन चलै, श्वास भानु की ओर ।
आयु जान इकमासकी, जीव जाय तन छोर ॥
नौ भृकुटी ससै श्रवण, पांच तारका जान ।
तीन नाक जिह्वा इकैकै, काल भेद पहिंचान ॥
भेद गुरू सों पाइये, गुरु बिनु लहै न जान ।
चरणदास यों कहत है, गुरुपर वारौं प्रान ॥
एक मास जो रैनि दिन, भानु दाहिनो होय ।
चरणदास यों कहत है, नर जीवै दिन दोय ॥
नाड़ी जो सुषमन चलै, पांच घड़ी ठहराय ।
पांच घड़ी सुषमन बहै, तवहीं नर मरि जाय ॥
नहीं चन्द्र नहिं सूर है, नहीं सुषमना बाल ।
मुख सेती श्वासा चलै, घड़ी चार में काल ॥
चारि दिना कै आठ दिन, बारह कै दिन बीश ।
ऐसे जो चंदा चलै, आंव जान बड़ ईश ॥
तीन रात अरु तीन दिन, चालै तत्त्व अकाश ।
एक बरस काया रहै, फेर काल बिसवाश ॥
दिन को तौ चंदा चलै, चलै रात को सूर ।
यह निहंचै करि जानिये, प्राण गमन बहदूर ॥
रात चलै स्वर चन्द में, दिन को सूरज बाल ।
एक महीना यों चलै, छठे महीने काल॑ ॥
जब साधू ऐसी लखै, छठे महीने काल ।
आगे ही साधन करै, बैठि गुफा ततकाल ॥
ऊपर खैंचि अपान को, प्राण अपान मिलाय ।
उत्तम करै समाधि को, ताको काल न खाय ॥
१ मृत्यु ॥
१०
१२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पवन पियै ज्वाला पवै, नाभि तले करि राह ।
मेरुदण्ड¹ को फोरिकै, बसै अमरपुर जाय ॥
जहां काल पहुंचे नहीं, जम की होय न त्रास ।
गगनमण्डल²कोजायकरि, करै उनमनी वास ॥
जहां काल नहिंज्वालहै, छूटै सकल सन्तापँ ।
होय उनमनी लीनमन, बिसरै आपा आप ॥
तीनों बन्ध लगाय कै, पांच वायु को साध ।
सुषमन मारग है चलै, देखै खेल अगाध ॥
शक्ति जाय शिवसों मिले, जहां होय मन लीन ।
महा खेचरी जो लगे, जानै जान प्रवीन ॥
आसन पदम लगाय करि, मूलबन्ध को बांधि ।
मेरुदण्ड सीधो करै, सुरति गगन को साधि ॥
चन्द सूर दोउ सम करै, ठोढ़ी³ हिये लगाय ।
षट चक्कर को बेधिकरि, शून्य शिखर को जाय ॥
इड़ा पिंगला साधिकरि, सुषमन में करिवास ।
परमज्योतिझिलमिलतहां, पूजै मन विश्वास ॥
जिन साधन आगे करी, तासों सब कुछ होय ।
जब चाहै जबहीं तभी, काल बचावै सोय ॥
तरुणअवस्थाजोग करि, बैठि रहै मन जीत ।
काल बचावै साध वह, अन्त समय रणजीत ॥
सदा आप में लीन रहु, करिकै जोगाभ्यास ।
आवत देखै काल जब, गगनमण्डल कर वास ॥
शनै शनै साधि करि, राखै प्राण चढ़ाय ।
१ जो नाभि से लेकर मस्तक तक मिली हुई नाड़ी है २ आकाश ३
दाढ़ी का अर्द्धभाग ॥
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२१
पूरो जोगी जानिये, ताको काल न खाय ॥
पहिले साधन ना कियो, गगनमण्डल को जान ।
आवत जानै काल जब, कहा करै अज्ञान ॥
जोग ध्यान कीन्हों नहीं, ज्वान अवस्था मीत ।
आगम देखै काल को, कहा सकै वह जीत ॥
काल जीति हरिसोंमिलै, शून्य महल अस्थान ।
आगे जिन साधन करी, तरुण अवस्था जान ॥
काल अवधि बीतै तभी, जबै बीति सब जाय ।
जोगी प्राण उतारिये, लेहि समाधि जगाय ॥
काल जीति जगमें रहै, मौत न व्यापै ताहि ।
दशौद्वार को फोरिकै, जब चाहै जब जाहि ॥
सूरज मण्डल चीरिकै, जोगी त्यागै प्रान ।
सायुजं मुक्ति सोई लहै, पावै पद निर्वान ॥
कृष्णपक्ष के मध्य में, दक्षिण होय जु भान ।
जोगी वपुं नहिं छांडिये, राजा होय फिरि आन ॥
राज पाय हरिभक्तिकरि, पूरवली पहिचान ।
जोग जुक्ति पावै बहुरि, दूसर मुक्ति निदान ॥
उतरायण सूरज लखै, शुक्ल पक्ष के माहिं ।
जोगी काया त्यागिये, यामें संशय नाहिं ॥
मुक्ति होय बहुरै नहीं, जीव खोज मिटिजाय ।
बुन्द समुन्दर मिलिरहै, दुतिया ना ठहराय ॥
दक्षिणायन सूरज रहै, रहै मास षट जानि ।
फिर उतरायणजाय करि, रहै मास षट मानि ॥
दोनों स्वरको शुद्ध करि, श्वासा में मन राखि ।
१ दशौ इन्द्रिय २ परब्रह्ममें योजित होजाना ३ देह ॥
१२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भेद स्वरोदय पायकरि, तब काहू सों भाखि ॥
जो रण ऊपर जाइये, दहिने स्वर परकाश ।
जीति होय हारै नहीं, करै शत्रु को नाश ॥
दुर्जन को स्वर दाहिनो, तेरो दहिनो होय ।
जो कोई पहिले चढै, खेत जीति है सोय ॥
सुषमन चलत न चालिये, जुद्ध करन सुन मीत ।
शीश कटावै कै फँसै, दुर्जन की होय जीत ॥
जो बायें पृथ्वो चलै, चढ़ि आवै कोइ भूप ।
आप बैठि दल पेलिये, बात कहत हौं गूप ॥
जल पृथ्वी स्वर में चलै, सुनै कान दै वीर ।
सुफल काज दोनों करै, कै धरती कै नीर ॥
पावकअरु आकाश तत, वायु तत्त्व जो होहिं ।
कछू काज नहिं कीजिये, इन में बरजौं तोहिं ॥
दहिनों स्वर जब चलतहै, कहीं जाय जो कोय ।
तीन पाँव आगे धरै, सूरज को दिन होय ॥
बायें स्वर में जाइये, बायें पग धरि चार ।
बावों डग पहिले धरै, होय चन्द्र को बार ॥
दहिने स्वर में जो चले, दहिने डग धरि तीन ।
बायें स्वर में चारि डग, बावीं कर परबीन ॥
गर्भवती के गर्भ को, जो कोइ पूँछै आय ।
बालक होय कै बालकी, जीवै कै मरि जाय ॥
प्रद्यं १ बालक होनकी, जो कोउ पूँछै तोहिं ।
बायें कहिये छोकरी, दहिने बेटा होहिं ॥
दहिने स्वर के चलतही, जो वह पूँछै आय ।
१ प्रश्न ॥
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२३
वाको बावों स्वर चलै, बालक होय मरि जाय ॥
दहिने स्वर के चलतही, जो वह पूंछै वैन ।
वाहू को दहिनो चले, लरिका होय सुख चैन ॥
बायें स्वर के चलत ही, आय कहै जो कोय ।
बेटी होय जीवै नहीं, वाको दहिनो होय ॥
बायें स्वर के चलतही, जो वह पूंछै बात ।
वाहू को बावों चलै, बेटी होय कुशलात ॥
तत अकाश के चलतही, कहै गर्भ की आय ।
होय नपुंसक हींजड़ा, कै सतवांसो जाय ॥
लेन परीक्षा गर्भ की, जो कोई पूंछै आय ।
अग्नि होय जो तासमै, ओछाही गिरि जाय ॥
क्षण बायें क्षण दाहिने, दो स्वर सुषमन होय ।
पूंछन वारे सों कहौ, बालक उपजें दोय ॥
वायु तत्त्व के चलतही, जो कोउ पूंछै आय ।
छाया होय बाढ़े नहीं, पेटहि माहिं बिलाय ॥
जो कोई पूंछै आयकै, याको गर्भ कि नाहिं ।
दहिनों बावों स्वर लखै, साधि श्वास के माहिं ॥
बन्ध ओर जो आय करि, है पूंछै जो कोय ।
बन्ध ओर तौ गर्भ है, बहते स्वर नहिं होय ॥
इड़ा पिंगला सुषमना, नाड़ी कहिये तीन ।
सूरज चन्द विचारिकै, रहै श्वास लवलीन ॥
जैसेकछुआ सिमिटिकरि, आपी माहिं समाय ।
ऐसे ज्ञानी श्वास में, रहै सुरति लवलाय ॥
श्वास बाण बै क्रोड़ की, आव जान नरलोय ।
बीतजाय श्वासा जबै, तबहीं मृत्युक होय ॥
१२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
इक्कीस हजार छः सौ चलै, रात दिना जो श्वास ।
बीसा सौ जीवै बरष, होय अघन को नास ॥
अकाल मृत्यु कोई मरै, होय करि भुक्तै भूत ।
श्वास जहां बीतै सभी, जब आवै यमदूत ॥
चारौ संजम साधिकरि, श्वासा जुक्ति चलाय ।
अकाल मृत्यु आवै नहीं, जीवै पूरी आय ॥
सूक्ष्म भोजन कीजिये, रहिये ना पड़ि सोय ।
जल थोरो सो पीजिये, बहुत बोल मत खोय ॥
कुं० मोक्ष मुक्ति तुम चहत हौ तजौ कामना काम ।
मनकी इच्छा मेटिकरि भजो निरञ्जन नाम ॥
भजो निरञ्जन नाम तत्व देह अध्यास मिटावो ।
पञ्चन के तजि स्वाद आप में आप समावो ॥
जब छूटै झूठी देह जैसे के तैसे रहिया ।
चरणदास यहि मुक्ति गुरूने हमसों कहिया ॥
दो० देह मरै तू है अमर, पारब्रह्म है सोय ।
अज्ञानी भटकत फिरै, लखै सो ज्ञानी होय ॥
देह नहीं तू ब्रह्म है, अविनाशी निर्बान ।
नित न्यारो तू देह सों, देह कर्म सब जान ॥
डोलन बोलन सोवनो, भक्षण करन अहार ।
दुख सुख मैथुनरोग सब, गरमी शीत निहार ॥
जाति वरण कुल देहकी, सूरति मूरति नाम ।
उपजै विनशै देह सो, पांच तत्त्व को गाम ॥
पावक पानी वायु है, धरती और अकास ।
पांच तत्त्व के कोट में, आय कियो तैं वास ॥
पांच पचीसौ देह सँग, गुन तीनों हैं साथ ।
ज्ञानस्वरोदयवर्णन १२५
घट उपाधि सो जानिये, करत रहैं उतपाथ ॥
जिह्वा इन्द्री नीरकी, नभको इन्द्री कान ।
नासा इन्द्री धरणि की, करि विचार पहिंचान ॥
त्वचा सुइन्द्री वायु की, पावक इन्द्री नैन ।
इनको साधै साधु जो, पद पावै सुख चैन ॥
निद्रा संगम आलकस, भूख प्यास जो होय ।
चरणदास पांचौ कही, अग्नि तत्व सों जोय ॥
रक्त बिन्द कफ तीसरो, मेद मूत्र को जान ।
चरणदास परकिरत ये, पानी सों पहिंचान ॥
चाम हाड़ नाड़ी कहूं, रोम जान और मास ।
पृथ्वी की परकिरत ये, अन्त सबन को नास ॥
बल करना अरु धावना, उठना अरु संकोच ।
देह बढ़ै सो जानिये, वायु तत्त्व है शोच ॥
काम क्रोध मोह लोभ भै, तत अकाश कौ भाग ।
नभकी पांचौ जानिये, नित न्यारो तू जाग ॥
पांच पचीसौ एकही, इनके सकल स्वभाव ।
निर्विकार तू ब्रह्म है, आप आपको पाव ॥
निराकर निर्लिप्त · तू, देही जान अकार ।
आनि देही मान मत, यही ज्ञान ततसार ॥
शस्तर छेदि सकै नहीं, पावक सकै न जारि ।
मरै मिटै सो तू नहीं, गुरुगम भेद निहारि ॥
जलै कटै काया यही, बनै मिटै फिरि होय ।
जीवऽविनाशो नित्य है, जानै बिरला कोय ॥
आंख नाक जिह्वा कहूं, त्वचा जान अरु कान ।
पांचौ इन्द्री ज्ञान ये, जानै जान सुजान ॥
१२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुदा लिंग मुख तीसरो, हाथ पाँव लखि लेह ।
पांचौ इन्द्री कर्म हैं, यह भी कहिये देह ॥
पृथ्वी काल जो ठौर है, मुखै जानिये द्वार ।
पीलो रंग पहिंचानिये, पीवन खान अहार ॥
पित्ते में पावक रहै, नैन जानिये द्वार ।
लालरंग है अग्नि को, मोह लोभ आहार ॥
जल को बासा भाल है, लिंग जानिये द्वार ।
मैथुन कर्म अहार है, धौलो रंग निहार ॥
पवन नाभि में रहत है, नासा जानि दुआर ।
हरो रंग है वायु को, गन्ध सुगन्ध अहार ॥
अकाश शीश में वास है, श्रवण दुआरो जान ।
शब्द कुशब्द अहार है, ताको श्याम पिछान ॥
कारण सूक्ष्म लिंग है, अरु कहियत अस्थूल ।
शरीर तीन सों जानिये, मैं मेरी जड़ मूल ॥
चितबुद्धि मन अहंकार जो, अन्तःकरण सुधार ।
ज्ञान अग्नि सों जारिये, करिकरि मीत विचार ॥
शब्द सपरसरु गन्ध है, अरु कहियत रस रूप ।
देह कर्म्म तनमात्रा, तू कहियत निहरूप ॥
निराकार अद्वै अचल, निर्बासी तू जीव ।
निरालम्ब निर्वैर सो, अज अविनाशी सीव ॥
वावों कोठा अग्नि को, दहिने जल परकास ।
मन हिरदय अस्थान है, पवन नाभि में वास ॥
मूल कमल दल चारको, लाल पॅखरी रङ्ग ।
गौरीसुत वासो कियो, छह्यै जाप इकङ्ग ॥
पटदल कमल पियरे वरण, नाभी तले संभाल ।
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२७
षट सहस्र जपि जापले, ब्रह्म सावि¹त्री नाल ॥
दशम पंखरी कमल है, नील वरण सो नाम ।
विष्णुलक्षिमी वासकिनो, षट सहस्र पर जाप ॥
अनहृद चक्र हृदय रहै, द्वादश दलऔर श्वेतं ।
षट सहस्र जपि जापले, शिव शक्ती जहाँ हेत ॥
षोड़शदल को कमल है, कण्ठ वास शशि रूप ।
जाप सहस्र जहाँ जपै, भेद लहै अति गूप ॥
अग्नि चक्र दो दलकमल, त्रिकुटी धाम अनूप ।
जाप सहस्र जहां जपै, पावै ज्योति स्वरूप ॥
दल हजार को कमल है, गगन मण्डल में वास ।
जाप सहस्र जहां जपै, तेज पुंज परकास ॥
जोग जुक्तिकरि खोजिले, सुरत निरत करचीन ।
दश प्रकार अनहद बजै, होय जहाँ लवलीन ॥
कुं० एक भंवर गुंजारसी दूजे घुंघुरू होय ।
तीजे शब्द जु शंखका चौथे घण्टा सोय ॥
चौथे घण्टा सोय पाँचवें, ताल जु बाजै ।
छठे सुमुरली नाद सातवें भेरि जु गाजै ॥
अठवें शब्द मृदंग का नाद नफीरी नोय ।
दसवें गरजनि सिंहसी चरणदास सुनि लोय ॥
दो० दश प्रकार अनहद घुरै, तजत जोगी होय लीन ।
इन्द्री थकि मनुआँ थकै, चरणदास कहि दीन ॥
'तीन बन्ध नौनाटिकाँ२, दशवाईं को जान ।
प्राण अपान समान है, और कहिदेत उदान ॥
'व्यानवायुऔरकिरकिरा, कूरम बाई जीत ।
१ शारदा २ नाड़ी ॥
१२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
नाग धनंजय देवदत, दशवाईं रणजांत ॥
नवों द्वार को बन्ध करि, उत्तम नाड़ी तीन ।
इड़ा पिंगला सुषमना, केलि करैं परवीन ॥
करते प्राणायाम के, तिरगये पतित¹ अनेक ।
अनहद ध्वनि के बीचमें, देखै शब्द अलेख ॥
पूरक करि कुम्भक करै, रेचक पवन उतार ।
ऐसे प्राणायाम करि, सूक्ष्म करै अहार ॥
धरती बन्ध लगायकर, दशौ वायु को रोक ।
मस्तक प्राण चढ़ायकरि, करै अमरपुर भोग ॥
पांचौ मुद्रा साधि करि, पावै घट को भेद ।
नाड़ी शक्ति चढ़ाइये, षट चक्कर को छेद ॥
जोग जुक्तिकै कीजिये, कै अजपा को ध्यान ।
आपा आप विचारिये, परम तत्त्व को ज्ञान ॥
शूद्र वैश्य शरीर है, ब्राह्मण और राजपूत ।
बूढ़ा बाला तू नहीं, चरणदास औधूत ॥
काया माया जानिये, जीव ब्रह्म है मित्त ।
काया छुटि सूरत मिटे, तू परमातम नित्त ॥
पाप पुण्य आशा तजौ, तजौ मान और थाप ।
काया मोह विकार तजि, जपै सु अजपा जाप ॥
आप भुलानौ आपमें, बँधो आपही आप ।
जाको ढूंढ़त फिरत है, सो तू आपहि आप ॥
इच्छा दुई विसारिकर, होय न क्यों निर्वास ।
तूतौ जीवनमुक्त है, तजो मुक्ति की आस ॥
पवन भई आकाश सों, अग्नि वायुसों होय ।
१ पापी ॥
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२६
पावक सों पानी भयों, पानी धरती सोय ॥
धरती मीठे स्वाद है, खारी स्वाद सुनीर ।
अग्नि चरपरो स्वाद है, खट्टो स्वाद समीर ॥
खट्टा मीठा चरपरा, खारी पर मन होय ।
जबहीं तत्त्व विचारिये, पांच तत्त्व में कोय ॥
स्वाद नाप ओर रंग है, और बताई चाल ।
पांच तत्त्वकी परख यह, साधि पाव ततकाल ॥
तिरकोनी पावक चले, धरती तौ चौकोर ।
शून्यस्वभाव अकाशको, पानी लांबो गोल ॥
अग्नि तत्त्व गुण तामसी, कही रजोगुण बाय ।
पृथ्वी नीर सतोगुणी, नभ है अस्थिर¹ भाय ॥
नीर चलै जब श्वास में, रण ऊपर चढ़ि मीत ।
वैरी को शिर काटकरि, घर आवै रणजीत ॥
पृथ्वी के परकास में, युद्ध करै जो कोय ।
दोउ दल रहैं बराबरी, हारि वायु मैं होय ॥
अग्नि तत्त्वके बहतही, युद्ध करन मति जाव ।
हारि होय जीतै नहीं, अरु आवै तन घाव ॥
तत अकाश में जो चलै, तौ ठाईं रहिजाय ।
रणमाहीं काया छुटै, घर नहिं देखै आय ॥
जल पृथ्वी के जोग में, गर्भ रहै सो पूत ।
वायु तत्त्व में छोकरी², आंबर सूतक सूत ॥
पृथ्वी तत्व में गर्भ जो, बालक होवे भूप ।
धनवन्ता सोइ जानिये, सुन्दर होय स्वरूप ॥
अग्नि तत्त्व जब चलत है, कभी गरभ रहिजाय ।
१ न चलसकै २ लड़की ॥
१३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
गर्भ गिरे माता दुखी, हो माता मरि जाय ॥
वायु तत्त्व स्वर दाहिने, करै पुरुष जब भोग ।
गर्भ रहै जो तासमै, देही आवै रोग ॥
आसन संयम साधिकरि, दृष्टि श्वास के माहिं ।
तत्त्व भेद यों पाइये, बिन साधे कुछ नाहिं ॥
आसन पदम लगायकै, एक बरत नित साध ।
बैठे लेटे डोलते, श्वासाही आराध ॥
नाभि नासिकामाहिंकरि, सोहं सोहं जाप ।
सोई अजपा जाप है, छुटै पुण्य अरु पाप ॥
भेद स्वरोदय बहुत है, सूक्ष्म कह्यो बनाय ।
ताको समझिबिचारिले, अपनो चित मनलाय ॥
धरणि टरै गिरिवर टरै, ध्रुव टरै सुन मीत ।
वचन स्वरोदय ना टरै, कहै दास रणजीत ॥
शुकदेव गुरूकी दया सों, साधु दया सों जान ।
चरणदास रणजीत ने, कह्यो स्वरोदय ज्ञान ॥
छप्पै—डहरे में मेरो जनम नाम रणजीत पिछानो ।
मुरली को सुत जान जात दूसरि पहिंचानो ॥
बाल अवस्था माहिं बहुरि दिल्ली में आयो ।
रमत मिले शुकदेव नाम चरणदास धरायो ॥
जोग जुक्ति हरि भक्तिकरि ब्रह्मज्ञान दृढ़करि गह्यो ।
आतम तत्त्वविचारिकैअजपा में मन सनिरह्यो ॥
इति श्रीचरणदासजीकृतज्ञानस्वरोदयसंपूर्णम्
हंसनाथउपनिषद्वर्णन । १३१
अथ श्रीचरणदासकृत पंचउपनिषद्
अथर्वणवेद भाषा प्रथम
हंसनाथलिख्यते ॥
दो० बन्दत श्री शुकदेव को, उनको हिय में लाय ।
छिप्यो भेद परगट कियो, परमारथ के दाय ॥
संस्कृत भाषा करि, ताको यह दृष्टान्त ।
खोलि खोलि सबही कही, समझै छूटै भ्रान्त¹ ॥
ज्यों कूंएं सों नीर लै, बाहर दियो भराय ।
विना यतन कोई पियो, तिरषावन्त² अघाय ॥
पो दीन्ही शुकदेव ने, मैं जल काढ़नहार ।
प्यासा कोइ न जाइयो, टेरों वारंवार ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य जो, अरु शूद्रहु जो होय ।
वह पीवैगा हेत करि, बहु प्यासा जो कोय ॥
मुक्तिहु नीकी प्यास जो, काहूही को होय ।
और मनुष जग प्यास में, रहे जु मृतक होय ॥
यह जग ऐसो जानिये, मृगतृष्णा को नीर ।
निकट जाय प्यासा कोई, कभी न भागै पीर ॥
उनकी प्यास बुझै नहीं, होय नहा हिय चैन ।
ज्ञान सुधा तजि जात है, धोखे को जल लैन ॥
ज्ञान नीर तिरपत भये, निश्चल बैठे दास ।
संसारी प्यासे गये, पूरी भई न आस ॥
१ भ्रम २ पियासा ॥
१३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
संस्कृत था कूप सम, भाषा नीर निकास ।
प्याऊं जिज्ञासून को, तिनकीं भगै पियास ॥
अष्टपदी ॥
वेदहि की उपनिषद् जु मैं भाषा करी ।
जो कुछ था वहिमाहिं सोई जैसे धरी ॥
सुनि समझै मन माहिं, और करनी करै ।
आवागमन मिटाय नहीं देही धरै ॥
जगकी व्याधा¹ छूटि मुक्तिपद पावई ।
जाग्रत पहुँचे ठौर स्वप्न बिसरावई ॥
तिमिर² सभी भजिजाय उजारा होय है ।
सूझै आतम रूप द्वैँतता खोय है ॥
उपजै अति आनन्द द्वन्द दुख जाय है ।
तिरंपति निर्मलज्ञान विज्ञान अघाय है ॥
जोपै करै विचार और गुरुसों लहै ।
वाकी गहनी गहै और रहनी रहै ॥
गुरु शुकदेव प्रताप सो चितते गाइया ।
चरणहिदासा होय सबन शिर नाइया ॥
दो० पूजे ऋषि मुनि देवता, पूजे इन्द्रहु भूप ।
पूजा सबही इष्ट को, देखा हरि के रूप ॥
सर्वत्रहि प्रभु देखिकरि, सबको शीश नवाय ।
उपनिषदैं जो वेद की, परगट कहीं बनाय ॥
अष्टपदी ॥
प्रथम प्रगट करी छिपेही भेदकी ।
हंस नामऽहंनाम अथर्वणवेद की ॥
१ दुःख २ अन्धकार ॥
हंसनादूउपनिषद्वर्णन । १३३
गौतमऋषि करि चाव ऋषीश्वर पै गये ।
संत सुजातजु नाम बहुत आदर किये ॥
गौतम स्तुति करी बहुतही प्रीति सों ।
फिरि पूंछी यह बात जु लघुता रीति सों ॥
परमेश्वर पहिंचान मोहि समुझाइये ।
मुक्तहोन के पन्थ सबै जु दिखाइये ॥
ह्वैकर बहुत प्रसन्न* ऋषीश्वर बोलिया ।
गौरा अरु महादेव की चरचा खोलिया ॥
सब देवन के देव महादेव हैं सही ।
उपनिषदें जो वेद कि गौरा सों कही ॥
सो मैं तुमसों कहौं प्रीति के भाव सों ।
तुमहूं नीके सुनौ अधिकही चाव सों ॥
गुप्त महा यह भेद हिये में राखिये ।
जो जड़ मूरख होय तासु नहिं भाखिये ॥
दो० हरिभक्ता अरु गुरुमुखी, तप करने की आस ।
सतसंगी सांचा यती१, ताहि देहु चरनदास ॥
अष्टपदी ॥
अब मैं कहौं संभाल सुरत ह्वां दीजिये ।
यह तौ अचरज कथा श्रवण सुनि लीजिये ॥
यही श्वास कहि हंस आय अरु जाय है ।
पूरा सतगुरु मिलै तौ भेद लखाय है ॥
जो कोउ याको समझि करै अरु ध्यानहीं ।
ऋद्धि सिद्धि सुखहोहिं जु उपजै ज्ञानहीं ॥
अन्त मुक्तिही होय अभैपद में रहै ।
१ योगी ॥
१३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बहुरौ जन्म न होय परम आनँद लहै ॥
अब मैं वरणौं हंस और परमहंसही ।
जो समझे है ब्रह्म जाय सब संशही ॥
हंस हंस जो मंत्र अर्थ पहिचानिये ।
वह मैंहूँ यों कहै निश्चय करि जानिये ॥
यह मंतर सब माहिं सदाही भरि रह्यो ।
कोटिन में कोई जानि ध्यान सोइ धरि रह्यो ॥
जैसे काठ में आगि तिलों में तेल है ।
तैसे सब घटमाहिं इसी का मेल है ॥
दो० दूध मध्यज्यों घीव है, मेहँदी माहीं रंग ।
यतन बिना निकसनहीं, चरणदास सो ढंग ॥
जो जानै या भेदकौं, और करै परवेश ।
सो अविनाशी होत है, छूटै सकल कलेश ॥
अष्टपदी ॥
तन मथने को यतन कहूँ अब जानिये ।
ज्यों निकसै ततसार विलोवन ठानिये ॥
पहिले चक्र जानि मूल द्वारे बिषे ।
जितही पाँव की एँडी सूं बन्ध दे रखे ॥
मूल चक्रसों खैंचि अपान चलाइये ।
दूजे चक्र पास जु आनि फिराइये ॥
दहिनी ओरसों तीनि लपेटे दीजिये ।
तीजे चक्र माहिं गमन फिरि कीजिये ॥
चौथे चक्र माहिं पवन जो लाइये ।
बहुरौ पाँचवें चक्र में जू पहुंचाइये ॥
षष्ठम चक्र माहिं जु तांहि चढ़ाइये।
हंसनादउपनिषद्वर्णन । १३५
सो त्रिकुटी के मध्य तहां ठहराइये ॥
रोकै त्रिकुटी माहिं आनिके वायुको ।
षट्चक्र को भेदि चढ़ै जव धायको ॥
अपान वायु चढ़िजाय वहीं अस्थान है ।
प्रान वायु द्वै जाय साधु कोइ जान है ॥
रोकै प्रानहि वायु त्रिकुटी मध्यही ।
ओं का करै ध्यान शीश में मध्यही ॥
यह तौ ऊंचा ध्यान जु अधिक अनूपही ।
चरणाहदासा होय जु ब्रह्म स्वरूपही ॥
दो० नाम ब्रह्म का है नहीं, है तो ॐकार ।
जानै आपन को वही, मैं हौं तत्त्व अपार ॥
अष्टपदी ॥
अनहद शब्द अपार दूर सों दूर है ।
चेतन निर्मल शुद्ध देह भरपूर है ॥
ताहि निःअक्षर जानि और निष्कर्म है ।
परमातम तेहि मानि वही परब्रह्म है ॥
हृदय कमल के माहिं ध्यान सोहं करै ।
वाहि को अजपा जान सुरति मन लै धरै ॥
बिनहिं जपे जप होय- सुसांची बातही ।
सहस इक्कीस अरु छस्सौ जहां दिन रातही ॥
याको कीजै ध्यान होत है ब्रह्मही ।
धारै तेज अपार जाहि सब भ्रमही ॥
वा पटतर कोइ नाहिं जु योंहीं जानिये ।
चन्द सूर्य अरु सृष्टि के माहिं पिछानिये ॥
सो वह तेज अपार आपको मानिये ।
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