भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२३
वाको बावों स्वर चलै, बालक होय मरि जाय ॥
दहिने स्वर के चलतही, जो वह पूंछै वैन ।
वाहू को दहिनो चले, लरिका होय सुख चैन ॥
बायें स्वर के चलत ही, आय कहै जो कोय ।
बेटी होय जीवै नहीं, वाको दहिनो होय ॥
बायें स्वर के चलतही, जो वह पूंछै बात ।
वाहू को बावों चलै, बेटी होय कुशलात ॥
तत अकाश के चलतही, कहै गर्भ की आय ।
होय नपुंसक हींजड़ा, कै सतवांसो जाय ॥
लेन परीक्षा गर्भ की, जो कोई पूंछै आय ।
अग्नि होय जो तासमै, ओछाही गिरि जाय ॥
क्षण बायें क्षण दाहिने, दो स्वर सुषमन होय ।
पूंछन वारे सों कहौ, बालक उपजें दोय ॥
वायु तत्त्व के चलतही, जो कोउ पूंछै आय ।
छाया होय बाढ़े नहीं, पेटहि माहिं बिलाय ॥
जो कोई पूंछै आयकै, याको गर्भ कि नाहिं ।
दहिनों बावों स्वर लखै, साधि श्वास के माहिं ॥
बन्ध ओर जो आय करि, है पूंछै जो कोय ।
बन्ध ओर तौ गर्भ है, बहते स्वर नहिं होय ॥
इड़ा पिंगला सुषमना, नाड़ी कहिये तीन ।
सूरज चन्द विचारिकै, रहै श्वास लवलीन ॥
जैसेकछुआ सिमिटिकरि, आपी माहिं समाय ।
ऐसे ज्ञानी श्वास में, रहै सुरति लवलाय ॥
श्वास बाण बै क्रोड़ की, आव जान नरलोय ।
बीतजाय श्वासा जबै, तबहीं मृत्युक होय ॥