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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
आनंदहि आनंद जहाँ, तहां न काल कलेश।
तीनों गुन नहि पाइये, ह्वांनहिं मायालेश॥
जीवातम परमात्मा, होय जाय वा ठौर।
ध्याता ध्यानन ध्येह जहँ, तहांन किरिया और॥
महावन्धसाधनविधि॥
महाबन्ध तोहिं पहल बताऊं। पाछे मूलवन्ध समझाऊं॥
बायां पाँव सिवन गहि दीजै। मूल द्वार ऐंडी बँध कीजै॥
दहिनी जंघ जंघपर लावै। गउमुख आसन नाम कहावै॥
राखै चिबुक हृदय पर लाय। पवनराह पूरव को जाय॥
ध्यान त्रिकूटी संयम करै। प्राण वायु हिरदे में धरै॥
महाबन्ध ऐसे करि साधै। गुरू प्रताप याहि औराधै॥
बिना पुरुष तिरियाकूं जानौ। बन्ध बिना मुद्रा पहिंचानौ॥
निरफल जायपुरुष बिन नारी। महावन्ध बिनु मुद्राधारी॥
माहिं कण्ठके ध्यान लगावै। सुरत निरत ह्वांईं ठहरावै॥
दो० महाबंध अस्थत करै, सो योगी द्वै जाय।
पवन पंथ मुंदित करै, ध्यान कण्ठ में लाय॥
शशियरकूं सूरज पर लावै। रेचक पूरक पवन फिरावै॥
महावंध करै अभ्यासा। अमृत अचवै बुझै पियासा॥
जरा मृत्यु देही नहिं आवै। महा बंध तीनौ गुन पावै॥
जठर अग्नि परचै बहुभारी। निशिदिन माहिं करै अठवारी॥
पहर पहर भर पवन भरीजै। प्रथम अल्प अभ्यास करीजै॥
तिय सेवन तापन नहिं करै। काम अग्नि काया नहि जरै॥
दो० ऐसी विधि साधै पवन। योग पंथ धरि पाय।
पहर पीङ्गला बनत जन आयुरदा बढ़िजाय॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६७
अथ मूलबंध ॥
मूलबंध अब कहतहूं, अपान वायु वश होय ।
ऊपर कूं खैंचन करै, मिलै प्राण मै सोय ॥
कमल कमल सीधे भवै, 'नाभि तले हो राह ।
आगे मारग सुगम हो, पहुँचै योगीनाह ॥
मूलबंध गुण ऐसा होई । वायुअधोगति जाय न कोई ॥
रेता ऊरध यासूं सधै । दिन दिन आयु सवाई बधै २॥
यासूं कारज सब वनिआवै । रोगरक्त को सभी नशावै ॥
योगी पहिले या आराधै । अपान वायु कूं नीके साधै ॥
अब मैं मूलबंध बतलाऊं । ज्योंका त्यों साधन दिखलाऊं ॥
गुदाबास याका तुम जानो । गुदा द्वार बंधनदै ठानो ॥
बायें पांव कि एँड़ीसेती । मूल द्वार रोकै करिहेती ॥
ऊरधही ३ कूं खैंचन कीजै । शुकदेव कहै नीके सुनलीजै ॥
अरु कबहूं मन ऐसीधरै । आसन पदम करन कूं करै ॥
कपड़े की इकगेंद बनावै । गुदा मध्य कसबंध लगावै ॥
योंभी वायु सधै वा भांती । जोपै लगारहै दिनराती ॥
पवन तले की ऊपरजावै । प्राण अपान सहज मिलजावै ॥
नाद बिंद रल मिलजा दोई । एकवर्ण साधै जो कोई ॥
योग माहिं यह भी परधान । बूढ़ी देह पलटहो ज्वान ॥
जठर ४ अगन बाढ़ै अधिकाय । जो चाहै तौ बहुतै खाय ॥
सुन चरणदास कहै शुकदेव । जो गुरु पूरा देवै भेव ॥
अथ जलंधरबंध ॥
दो० मूलबंध तोसूं कहा, गुण कह तब समुझाय ।
बंध जलंधर कहतहूं, सुन सरवन करि चाय ॥
१ तोंदी २ बाढै ३ ऊपर ४ पेट ॥

तीजा बंध जलंधर जानौ। कंठ वास ताका पहिचानौ ॥
ग्रीवा लटक चिबुक हिय लावै। कंठ पवन रोके परचावै ॥
हिरदै प्राण पूर करि रहिये। बंध जलंधर यासूं कहिये ॥
उरध पवन नीचे को जाय। अरध पवन ऊरधकूं लाय ॥
उदर मध्य लै ताहि बिलोय। ब्रह्मरन्ध्र जा पहुँचै सोय ॥
इह विधि ब्रह्मपंथकूं धावै। सहजै सहजै मध्य समावै ॥
जरा मरण जहँ भय नहिं व्यापै। लहै अमरपद होरह आप ॥
चरणदास शुकदेव बतावै। जोपै बंध उड्यान लगावै ॥
अथ उड्यानबंध ॥
दो० बंध उड्यान आगे कहा, जिह्वा उलट लगाय ।
कान आंख मुख नाकके, स्वर सब बंधकराय ॥
इह सुबंध महिमा अधिक, लागै बजर किवाँर ।
सातद्वार की बाटहो, निकसै नाहिं बयार ॥
पांचौ मुद्रा बंध सब, दिखलाया यह देश ।
•शुकदेव कहै रणजीत सुन, और कहूं उपदेश ॥
अष्टपदी छन्द ॥
चौरासीही जानि जुआसन योगके ।
सिद्ध पदम तिनमाहिं बड़ेही थोकके ॥
बहुनारिनके मांहिं जु नौनारीभनी ।
तिन मैं सुषमन जानबड़ी गुरुसूं सुनी ॥
तीनि बंधके माहि मूलकूं जानिये ।
मुद्रौही में बड़ी खेचरी मानिये ॥
वायुनमें परधान प्राणकं देखिये ।
सबकुंभकहूं माहिं केवलबड़ि लेखिये ॥
बानी चारौ मध्य पराही गाइये ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६६
चार अवस्थामाहिं तुर्या वड़िपाइये ॥
परम शून्यको ध्यान परेसून्हे परै ।
याकीसम कोइ नाहिं ध्यान तिनको धरै ॥
अजपाहीके जाप बराबर औरना ।
शीलदयासे मीत न कोई देहमा ॥
पूजन मैं बड़ि जान जुआतमकी करै ।
ज्ञानसमान न दान सकल विपता हरै ॥
गुरुसा रक्षक और नहीं कोइ लोकमें ।
योग युक्तिसा स्वाद नहीं कोइ भोकमें ॥
कह शुकदेव सुनौ रणजीतही ।
वड़ी वड़ी जोगांसे खोल तुमकूं जुदी ॥
छन्द ॥
अमरी करतै बजरी रोंकै बजरी करतैं बाई ।
रोंकै छींक साधना करिकै नासालेहु जँभाई ॥
जल संयमसूं नभकूं देखै संयम नादसुं ज्योती ।
संयम पवन होय थिरकाया सो वश राखै मोती ॥
जिया विछावै मृत्यकबौदै बूढ़ी होय न काया ।
संयम नींद विंदनहि जावै यह शुकदेव बताया ॥
दहिने स्वरमें भोजन कीजै बायें स्वरमें पानी ।
दहिने स्वरमें अमरी रेचै देह न होय पुरानी ॥
दहिने स्वरमें जलसूं न्हावै बायें स्वरमें लङ्की ।
शिव आसनसूं सोवन कीजै नारिन कीजै सङ्की ॥
पावकसूं तापन नहिं कीजै जो तापै तौ नैना ।
भोजन गरम न खट्टा खावै फटै झिरै नहिं मैना ॥
॥ ... ॥

१०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० गरमीही के रोग में, चन्द चला रवि बन्द ।
शीत रोग सूरज चला, शशि पर राखै बन्द ॥
तीन रोज कै पांच दिन, कै दिन राखै सात ।
रोग देखि जैसी करै, होय निरोगा गात ॥
सूरज रात चलाइये, द्योस चलावै चन्द ।
पवन फिरै ऊषा बधै, श्वास चलै जो मन्द ॥
कान आंख अरु दांतके, सबही रोग भजाहिं ।
श्याम वालनहिं श्वेतहों, करै 'जुनीकी दाहिं ॥
रुई पुरानी बहुतही, दिनकूं दहिने राखि ।
बायें राखै रैनिकूं, खोली साधन भाखि ॥
शीत उष्ण व्यापै नहीं, विष नहिं व्यापक होय ।
बीसबरस साधन किये, रहै विकार न कोय ॥
बासी भ्रष्ट न खाइये, सूक्ष्म करै अहार ।
जल बहुत पीवै नहीं, सपरस करै न नार ॥
तन मन साधै बचन ही, पाप न लगने देह ।
शुकदेवकहैचरणदाससुनि, अधकी साधन येह ॥
सब जीवन सुख दीजिये, सब सों मीठा बोल ।
आतम पूजा कीजिये, पूजा यही अतोल ॥
दया पुष्प चन्दन नंवन, धूप दीप दे मन्न ।
भाँति भाँति नैवेद्य सूं, करै देव परसन्न ॥
जो कोइ आवै राजसी, देहु बड़ाई ताहि ।
जाकूं देखो तामसी, करो नम्रता बाहि ॥
जो कोइ होवै सात्त्विकी, मिलै ताहि तजिमान ।
गुढ़ी खोल चर्चाकरो, लीजै ततमत छान ॥
ओरन कूं परसन करै, आपहु रहौ परसन्न ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । १०६
बासलहो हरि धाम में, ह्यां वा हो धन धन्न ॥
राचस तामस सात्त्विकी, क्षेत्तर तीनहिं भाँति ।
क्षेत्रक आतम देवहै, सबको सहिये क्रांति ॥
सब में देखे आप कूं, सब कूं अपने मांहिं ।
पावै जीवनमुक्ति को, यामें संशय नाहिं ॥
सब में देखे आतमा, आपन मैं करि ध्यान ।
यही ज्ञान ब्रह्मज्ञान है, यही जु है विज्ञान ॥
अहंकार मिटि ब्रह्महो, परमातम निरवान ।
शुकदेवाहो कहतहूं, चरणदास हिय आन ॥
जो तें पूंछा सो कहा, भेद कहा सब खोल ।
अरु तेरे हियमें कछू, सकुच खोल कर बोल ॥
शिष्यवचन ॥
अपना लखि किरपाकरी, समझायो बहुभांति ।
योग औरतैं गुरूजी, हिये में आई शांति ॥
तुम्हरी कह अस्तुति करूं, मोपै कही न जाय ।
इतनी शक्ति न जीभकी, महिमां कहै बनाय ॥
किरपाकरी अनाथ पर, तुमहो दीनानाथ ।
हाथ जोड़ि मांगौं, यही, मम शिर तुम्हरो हाथ ॥
मोसे रंक गरीबकी, तुम गहि पकरी बांह ।
भव बूड़ंत राखा मुझे, चरण कमलकी छाहं ॥
आपहि तुम किरपाकरी, मैं कित लहता तोहिं ।
तुमको पाऊं ढूंढ़िकरि, इतनी शक्ति न मोहिं ॥
व्यास पुत्र शुकदेव तुम, जक्त माहिं विख्यात ।
तुम दर्शन दुर्लभ महा, पुरुषनको न दिखात ॥

१०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बड़े भाग मेरे जगे, पूरुबले परताप ।
किरपा श्रीगोपाल की, आय मिले तुम आप ॥
चरणदास अपनो कियो, दियो परम सन्तोष ।
बैठि करूंगो ध्यानही, अब कुछ रह्यो न शोक ॥
चलत फिरत ह्यां आइया, तुम भरि दीन्ह्यो मोहिं ।
नैन प्राण तन मनसभी, देखत अरपे तोहिं ॥
चाहमिटी सब सुख भये, रहा न दुखका मूल ।
चाहूं तौ चाहूं यही, तुम चरणनकी धूल ॥
गुरुवचन ॥
योग तपस्या कीजियो, सकल कामना त्याग ।
ताको फलमत चाहियो, तजौ दोष अरु राग ॥
अष्ट सिद्धि जो पै मिलै, नेक न कीजै नेह ।
धरि हिरदय परमात्मा, त्यागे रहियो देह ॥
जेंती जगकी वस्तुहै, तामें चित्त न लाय ।
सावधान रहियो सदा, दियो तोहिं समुझाय ॥
बार बार तोसे कहूँ, ह्यां मत दीजो चित्त ।
सिद्ध स्वर्गफलकामना, तजि कीजो हरिमित्त ॥
जो कीजै हरि हेतही, एहो चरणहि दास ।
भक्तियोग अरु शुभकरम, नीकी ठौर निवास ॥
शिष्यवचन
ऐसेही अब करूंगो, तुम चरणन परताप ।
अष्ट सिद्धि समझौ चहौं, वर्णन कीजै आप ॥
समझौं तौ त्यागूं उन्हें, करवाओ पहिंचान ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । १०३
कहा नाम लक्षण कहा, कौन रहे अस्थान ॥
गुरुवचन ॥
कहि शुकदेव वर्णन करूं, अष्ट सिद्धि के नाउ ।
लक्षण गुण सबही सहित, नीके तोहिं समझाउ ॥
अथ अष्टसिद्धि के नाम ॥
प्रथमै अणिमा सिद्धि कहावै । चाहे तो छोटा ह्वै जावै ॥
अणु समान छिपि जावै सोई । ऐसी कला जु पावै कोई ॥
दूजी महिमा लक्षण एता । चाहे बड़ा होय वह जेता ॥
तीजी लघिमा वह कहवावै । पुष्पतुल्य हलका ह्वै जावै ॥
चौथी गरिमा कहूँ बिचारी । चाहे जितना होवै भारी ॥
पाँचवीं प्रापति सिद्धि कहावै । जित चाहे तितही ह्वै आवै ॥
छठवीं पराकाम्य गुण धरै । शक्ति पाय चाहे सो करै ॥
सातवीं सिद्धि ईशिता रानो । सबको आज्ञा माहिं चलानी ॥
दो० वशीकरण सिधि आठवीं, कहैं श्री शुकदेव ।
चाहे जिसको वश करै, अपनाही करि लेव ॥
चरणदास सिद्धैं कही, समझलेहि मनमाहिं ।
जो हैं जनुआं राम के, इनमें उरझैं नाहिं ॥
योग किये आठो सिधि पावै । कै भोगै कै चित न लगावै ॥
योग किये मन जीता जावै । पलटै जीव ब्रह्मगति पावै ॥
योगेश्वर चाहे सो करै । भरी रितावै रीती भरै ॥
योगेश्वर ईश्वर ह्वै जाई । दिन दिन बढ़ै कला सवाई ॥
तजिये भोग योगहीं करिये । तिरगुण परै ध्यानही धरिये ॥
चौथे पद में करै निवासा । काहू विधि का रहै न साँसा ॥
योग करै सोई परबीना । शुकदेव कहैं प्रकट कहि दीना ॥

१०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० पोथी माहीं देखि करि, करै जु कोई योग ।
तन छीजै सिधि ना भवै, देहो आवै रोग ॥
देखि देखि गुरु सों करै, लै अज्ञा रहु संग ।
सिद्धि होय, साधन सबै, कछू न आवै भंग ॥
योग तपस्या में बड़ा, पहुँचावै हरि पास ।
जन्म मरण बिपता मिटै, रहै न कोई आस ॥
शिष्यवचन ॥
मैं समझी जानी सभी, सूझभई हिय माहिं ।
किरपाकरि जो जो कहा, ताको बिसरूं नाहिं ॥
व्यासदेव श्री जनक जै, जै जै श्री शुकदेव ।
जै जै यह सुकतारहै, समुझायो करि हेव ॥
हियहुलसो आनँदभयो, रोम रोम भयो चैन ।
भये , पबित्तर कान ये, सुनि सुनि तुम्हरे बैन ॥
छप्पै ॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरू देवनके देवा ।
सर्व सिद्धि फल देन गुरू तुम मुक्ति करेवा ॥
गुरु केवट तुम होय करौ भवसागर पारी ।
जीव ब्रह्म करिदेत हरौ तुम व्याधा सारी ॥
श्रीशुकदेव दयाल गुरु चरणदास के शीश पर ।
किरपाकरि अपनौ कियौ सबही विधिसों हाथधर ॥
इति श्रीगुरुचेलासंवादअष्टाङ्गयोगसम्पूर्णम् ॥

योगसन्देहसागरवर्णन । १०५
अथ श्रीचरणदासकृतयोगसन्देहसागर
प्रारम्भः ॥
दो० अर्थ बताओ पण्डिता, ज्ञानी गुणी महन्त ।
जो तुम पूरे साधुहौ, भक्ता हरिके सन्त ॥
चरणदास पूंछैं 'अरथ, भेदी होय कहौ ।
समझौ तौ चर्चा करौ, नाहीं मौन गहौ ॥
ब्रहमण्डे सों पिण्डे जानौ । ठौर ठोर घट में पहिचानौ ॥
सात समुंदर घट में कहां । कछुवा रहै बताओ जहां ॥
शेषनाग किहं ठौर बिराजै । रूप वराह कौन छवि छाजै ॥
कहा चार काया में खान । चौरासी लख योनि बखान ॥
षट चक्कर को जो तुम जानौ । नाम सहित सब भेद बखानौ ॥
नाभि कुण्डली का परमान । कैसे जागै कहौ बखान ॥
सहज सहज वह कहां समावै । योगि होय सों भेद बतावै ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव । सो तौ जानै सबही भेव ॥
दो० कहां जु वासा पवन का, मन कौनी अस्थान ।
कहां हिये कीं आंखिहै, कैसे करै पिछान ॥
प्राण पुरुष अन्तर्गत' कैसे । क्योंकरि भेद बताओ जैसे ॥
इड़ा पिंगला सुषमन नारी । कैसे पलटैं बारी बारी ॥
आठ प्रकार के कुम्भक जानै । सो जुगता मेरे मन मानै ॥
चार अवस्था चार शरीरा । वाणी चारि नाम कहा वीरा ॥
कै प्रकार अजपा का जाप । कै अंगुल श्वासा का नाप ॥
क्यों आवै अरु क्यों वह जय । याका ज्ञानी करौ लखाय ॥
१'भीतरप्राप्त २ बाल किशोर पौगण्ड वृद्धादि चार अवस्था ॥

१०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
परा पश्यती मध्यमाँ कहा। कहा वैखरी देहु बता ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव। सो तौ जानै सबही भेव ॥
॰ दो० पद तीनौ कहूँ विष्णुके, स्वप्ना जाग्रत भेद ।
बामन अक्षर देह में, पुहुप द्वीप कहां स्वेत ॥
ऽ कहाँ इक्कीस काया में लोक। इन्द्र करैं कहाँ नित्त भोग ॥
ब्रह्मादिक शिव कहां त्रिदेवा। काविधि उनको पावै भेवा ॥
षोड़श चन्द कहां परकाशा। बारह सूर्य्यनका कित बाशा ॥
ऽ तारामण्डल कैसे दरशैं। त्रिकुटी संयम कैसे परशैं ॥
त्रैवेणी को कैसे पावै। रंकार कहाँ शब्द जगावै ॥
वर्णों अक्षर ॐकारा। तासे भयो सकल संसारा ॥
ऽ जाका कीजै कैसे ध्याना। कौन दिशा अरु कोअस्थाना ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव। सो तौ जानै सबही भेव ॥
दो० निर्गम सुर्गम भेद कहु, श्वास उसास बताव ।
काया में विष कहां है, बिन्दु कुण्ड दर्शाव ॥
जीव ब्रह्म में केता बीच। कौन कौन काया में नीच ॥
ऽ अमृतकुण्ड कौन अस्थान। बंक नालकी कहु पहिंचान ॥
ब्रह्मरन्ध्र का भेद लखाव। कामधेनु का बरण बताव ॥
ऽ मानसरोवर ताल बताय। तामें हंसा कैसे न्हाय ॥
ऽ विना सीप कहाँ उपजै मोती। विनाघीव कहाँजगमग ज्योती ॥
ऽ बिन सूरज कहाँ नितही धूप। भवँर गुफा का कैसा रूप ॥
ऽ शून्य शिखर का कीधर द्वारा। कै खिरकी अरु कहाअकारा ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव। सो तौ जानै सबही भेव ॥
दो० कहां दशौ दिगपाल हैं, कहाँ इन्द्रिन के देव ॥
अहार वास पँचतत्त्वको, बरणि बतावो भेव ॥
काशी अरु मथुरा है दोय। कहाँ देहमें कहिये सोय ॥

योगसन्देहसागरवर्णन । १०७

१ अरसठि तीरथ घट में ज्योंकर । सबका गुरु पुष्कर है क्योंकर ॥
कहां बसै बाई उद्यान । कहां बन्ध लागै उड्यान ॥
”कहांकपाट का कुञ्जी ताला । द्वादशकला कौन मतवाला ॥
”कण्ठ कूप उलटाहै कौन । नेजू कहा बतावो जौन ॥
”पनिहारी कहा कैसे भरैं । घड़िया कहाँ कहाँ भरिधरैं ॥
”कै प्रकार अमृतका स्वाद । कौन ठौर सों अनहद नाद ॥
अब्र डोर कैसे करिपावै । मकर तारका भेद बतावै ॥
चरणदासका गुरु शुकदेव । सोतौ जानै सबही भेव ॥
दो० घण्ट ताल का लम्बका, और अम्ब का बोल ।
चारि वस्तु ये कौन हैं, इन्हें बतावो खोल ॥
”कौन कमलपर गुरू विराजै । कै प्रकार अनहद धुनि बाजै ॥
”कै वाणी हैं अनहद तूरा । जानैगा कोइ साधू पूरा ॥
तेजपुञ्ज कै योजन आगे । अमरलोक कब सूझनलागे ॥
तीन शून्यकहाँ चौथा शून्य । जितही भूले पढ़ि अर

१०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नामरूप मुद्रौं का जान । तीन बंध का नाम बखान ॥
चौरासी आसन का नाँवँ । और बतावो मन के पाँवँ ॥
स्वर्ग मर्त्य अरु कहां पताल । कहां सत्य अरु कहां तिताल ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव । सोतौ जानै सबही भेव ॥
दो० कै प्रकार का योग है, कै प्रकारकी भक्ति ।
पांच भूमिका ज्ञानकी, सातकलाका अर्थ ॥
୨ को नगरी का राज करै । को जीवै अरु कौन मरै ॥
୨ पेट बड़ा किसका है जान । पूजा बड़ी ताहि पहिंचान ॥
୨ सब में बड़ा कौन आहार । ताको सुरता लेहु निहार ॥
୨ ताबिन एक घड़ी नहिं रहै । भेदी होय सो भेदै कहै ॥
୨ सबमें बड़ी कहा जो पूजा । जाकी सम दीखै नहिं दूजा ॥
कहा सो सबको लग्गमलग्गा । कौनपुरुष सो भग्गमभग्गा ॥
୨ कहा घटै सो घटैई घटै । कहा बढ़ै सो बढ़ैई बढ़ै ॥
୨ घटै न बढ़ै सो बस्तु कहा । घटे बढ़े भी ताहि बता ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव । सो तौ जानै सबही भेव ॥
୨ दो० क्षरके कहा जु अर्थ हैं, अक्षर देहु दिखाय ।
निअक्षर के रूपको, भिन्न भिन्न समझाय ॥
ॐकारका अर्थ बतवो । महत्तत्व का रूप दिखावो ॥
୨ मन चक्कर का कैसा रंग । मन मनसा दोउ कैसे संग ॥
୨ कौन घाट हौ लगे समाध । कित जा देखै खेल अगाध ॥
चौबिस शून्य हैं जहाँ जहाँ । बज्जर ताला लागै कहाँ ॥
वज्रद्वार बिन पावै कहाँ । बिन पाये उरले घर रहा ॥
आठ महलका करौ बखान् । कासों कहिये पद निर्वांन ॥
जो तुम जानौ ऊरधरेता । तौ तुम भेद कहौ अब केता ॥-
दीप मुद्रा अरु मुद्रा राज । जासों सुधरैं काया काज ॥

योगसन्देहसागर वर्णन । १०६
काया महलके जो तुम भेदी । ठौर ठौर कहु घटमें जेती ॥
पाँचंतत्त्व की इन्द्री दश । यही बतावो आगे बश ॥
चरणदासका गुरु शुकदेव । सोतौ जानै सबही भेद ॥
दो० चारदूध चौदह चौवारे, भेदी होय सो जानै ।
चरणदास शुकदेवका, बालक सो यह भेद बखानै ॥
छप्पय ॥
चंदकला कित छिपै बढ़ जब कितसों आवै ।
बादर कितसों होय फटै जब कहाँ समावै ॥
दीपलोय बुझिजाय जाय कित मोहिं बतावो ।
राति दिना कित जाय ध्रुवा केहि ठौर लखावो ॥
चरणदास शुकदेव सों पूँछतहौं शिरनाय के ।
तन छूटै जीजाय कित आवतहै किहि ठाँयते ॥
कवित्त ॥
देखो है तमाशा देह समझिकै विचारिलेहु, मूरुखनरहोय जो या बातमें हँसैगो ।
चीतेको मारि मृग नखशिख सुखायगयो, बाघनीको मारिवोकसिंहको ग्रसैगो ॥
बिल्लीको मारि चूहे प्रेमको नगारोदियो, दादुरहू पांच सर्प मारिकै बसैगो ।
कहै चरणदास ऐसे खेलसों लगाई आश, चिरिया के शीश तोरी बाजको लसैगो ॥
दो० पगलागूं शुकदेव के, और वारने जावं ।
गुप्तभेद मोसों कह्यो, सबवै नावं अरु ठावं ॥
सो तुमसों पूंछन करौं, हौं परषन के दाय ।
या सागर संदेह को, दीजै अर्थ बताय ॥
इति श्रीमन्महाराजसाहिबश्रीचरणदासकृतसंदेहसागरसंपूर्णम् ॥
०००००००००
१ पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश ॥

११० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ श्रीचरणदासकृतज्ञानस्वरोदय
प्रारम्भः ॥
दो० नमो नमो शुकदेव जी, परणम करौं अनन्त ।
तुम प्रसाद स्वरभेद को, चरणदास वर्णन्त ॥
ऽ पुरुषोत्तम परमातमा, पूरण बिस्वा बीश ।
ऽ आदिपुरुषअविचल तुहीं, तोहिं निवाऊं शीश ॥
कुं० ऽक्षर ॐ सों कहत हैं अक्षर सोहं जान ।
ऽ निहअक्षर श्वासा रहितहै ताहि को मन आन ॥
ऽ ताही को मन आन रात दिन सुरति लगावो ।
ऽ आपा आप विचारि औरना शीश नवावो ॥
ऽ चरणदास मथि कहतहैं अगम¹ निगम² की सीख ।
ऽ यही वचन ब्रह्मज्ञान का मानो बिस्वाबीस ॥
ॐ सूं काया भई सोहं सो मन होय ।
निहअक्षर श्वासा भई चरणदास भल जोय ॥
चरणदास भल जोय खेंचि मनवाँ तहं राखौ ।
क्षर अक्षर निहअक्षर एकै दुबिधा नाखौ ॥
ऽ जब दरशै एकही एक भेष यह सभी तिहारो ।
ऽ डार पात फल फूल मूल सो सभी निहारो ॥
श्वासा सों सोहं भयो सोहं ॐकार ।
ॐ सों रर्रा भयो साधो करो विचार ॥
ऽ साधो करो विचार उलटि घर अपने आवो ।
ऽ घट घट ब्रह्म अनूप सिमिरि करि तहाँ समावो ॥
१ पुराण २ वेद ॥

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १११
चारि वेद का भेद है, गीता का है जीव ।
चरणदास लखि आपको, तो मैं तेरा पीव ॥
दो० सब जोगन को जोग है, सब ज्ञानन को ज्ञान ।
सर्वसिद्धि को सिद्धि है, तत्त्व स्वरनको ध्यान ॥
ब्रह्मज्ञान को जाप है, अजपा सोहं साध ।
परमहंस कोइ जानि है, ताको मतो अगाध ॥
भेद स्वरोदय सो लहै, समझै श्वास उसास ।
बुरी भली तामें लखै, पवन सुरति मन गांस ॥
शुकदेव गुरू कृपा करी, दियो स्वरोदय ज्ञान ।
जब सों यह जानी परी, लाभ होय कै हान ॥
इड़ा^१ पिंगला^२ सुषमना^३, नाड़ी तीन विचार ।
दहिने बायें स्वरचलैं, लखै धारणा धार ॥
पिंगल दहिने अंग है, इड़ा सो बायें होय ।
सुषमन इनके बीच है, जब स्वर चालैं दोय ॥
जब स्वर चालैं पिंगला, तिहि मधि सूरज वास ।
इड़ा सो बायें अंग है, चन्द्र करत परकास ॥
उदय अस्त तिनकी लखै, निर्गम सुर्गम बिद्धि ।
और पावै तत बरणको, जब वह होवै सिद्धि ॥
शुकदेव कहिचरणदाससों, थिरचर स्वर पहिंचान ।
थिरकारज को चन्द्रमा, चरकारज को भान ॥
कृष्णपक्ष जबहीं लगै, जाय मिलत है भान ।
शुक्लपक्ष है चन्द्र को, यह निहचै करिजान ॥
मंगल अरु इतवार दिन, और शनीचर लीन ।


१ बाईं ओर की नाड़ी को कहते हैं २ दाहिनी ओर की नाड़ी को कहते हैं
३ दोनों के मध्य की नाड़ीको कहते हैं ॥

११२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुभकारज को मिलत हैं, सूरज के दिन तीन ॥
सोमवार शुकर भलो दिन, बृहस्पति को देखि ।
चंदजोग में सुफल हैं, कहैं चरणदास बीशेखि ॥
तिथिऔरवार विचारकरि, दहिनो बाऔं अंग ।
चरणदास कहै स्वर जो मिलै, शुभकारज परसंग ॥
कृष्णपक्ष के आदिहि, तीनि तिथ्य तक भान ।
फिरि चंदा फिरि भान है, फिरि चंदा फिरि भान ॥
शुक्लपक्ष के आदिही, तीनि तिथ्य लग चन्द ।
फिरि सूरज फिरि चन्द है, फिरिसूरज फिरि चन्द ॥
सूरजकी तिथि में चलै, जो सूरज परकास ।
सुख देही को करत हैं, लाहालाभ हुलास ॥
शुक्लपक्ष चन्दा चलै, परिवा लेहि निहार ।
फल आनंद मंगल करै, देही कूं सुखसार ॥
शुक्लपक्ष तिथि में चलै, जो परिवा को भान ।
होय क्लेश पीड़ा कछू, कै दुख कै कुछ हान ॥
सूरज की तिथि में चलै, जो परिवा को चन्द ।
कलह करै पीड़ा करै, हानि ताप कै द्वन्द ॥
ऊपर बायें सामने, स्वर बायें के संग ।
जो पूंछै शशि जोगमें, तौ नीको परसंग ॥
नीचे पीछे दाहिने, स्वर सूरज को राज ।
जो कोइ पूंछै आयकरि, तौ समझौ शुभकाज ॥
दहिनो स्वर जब चलत है, पूंछै बायें अंग ।
शुक्लपक्ष नहिं वार है, तौ निर्फल परसंग ॥
जो कोइ पूंछै आयकरि, बैठि दाहिनी ओर ।
चन्द चलै सूरज नहीं, नहिकारज बिधि कोर ॥

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । ११३
जो सूरज में स्वर चलै, कहै दाहिने आय ।
७ लग्नवार अरु तिथिमिलै, कहु कारज होइ जाय ॥
जो चन्दा में स्वर चलै, वायें पूंछै काज ।
तिथि अरु अक्षरवारमिलि, शुभकारज को साज ॥
७सात पांच नव तीन गिन, पन्द्रह ओर पचीश ।
काज बचन अक्षर गिनै, भानु जोग को ईश ॥
चार आठ द्वादश गिनै, चौदह सोलह मीत ।
चन्दजोग के संग हैं, चरणदास रणजीत ॥
कर्क मेष तुला मकर, चारौ चरती राश ।
सूरज सों चारौ मिलत, चरकारज परकाश ॥
मीन मिथुन कन्या कही, चौथी ओर धन मीत ।
'द्विस्वभाव' की सुषमना, मुरलीसूत रणजीत ॥
वृश्चिकसिंहवृषकुम्भ पुनि, बायें स्वरके संग ।
चन्द जोगको मिलत हैं, थिरकारज परसंग ॥
चित अपनो रिथर करै, नासा आगे नैन ।
श्वासा देखै दृष्टि सों, जब पावै स्वर बैन ॥
पांचघड़ी पांचो चलैं, फिरि वा चारहि बार ।
पांचतत्व चालै मिले, स्वरबिच लेह निहार ॥
धरती अरु आकाश है, और तीसरी पौन ।
पानी पावक पांच यों, करत श्वासमें गौन ॥
धरती तौ सोहीं चलै, अरु पीरौ रँग देख ।
बारह अंगुल श्वास में, सुरत निरतकर पेख ॥
ऊपर को पावक चलै, लाल बरण है भेष ।
चारि सु अंगुल श्वास में, चरणदास औ रेष ॥
नीचे को पानी चलै, श्वेत रंग है तासु ।

११४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सोलह अंगुल श्वास में, चरणदास कहै भासु ॥
हरो रंग है वायु को, तिरछी चालै सोय ।
आठ सुअंगुल श्वास में, रणजीत मीतकरिजोय ॥
स्वर दोनों पूरण चलैं, बाहर ना परकाश ।
श्याम रंग है तासु को, सोई तत्त्व आकाश ॥
जल पृथ्वी के जोग में, जो कोइ पूँछै बात ।
शशियर में जो स्वर चलै, कहु कारज होयजातं ॥
पावकऔर आकाश पुनि, वायु कभी जो होय ।
जो कोइ पूंछै आयकरि, शुभकारज नहिं होय ॥
जल पृथ्वी थिरकाज को, चरकारज को नाहिं ।
अग्नि वायु चरकाज को, दहिने स्वरके माहिं ॥
रोगी को पूंछै कोऊ, बैठि चन्द की ओर ।
धरती बायें स्वर चलै, मरै नहीं विधि क्रोर ॥
रोगी को परसंग जो, बायें पूँछै आन ।
चन्द बंध सूरज चलै, जीवै ना वह जान ॥
बहते स्वरसों आयकरि, शून्य ओर जो जाय ।
जो पूंछै परसंग वह, रोगी ना ठहराय ॥
शून्य ओर सों आयकर, पूंछै बहते श्वास ।
यह निश्चय करि जानिये, रोगी को नहिं नास ॥
शून्य ओर सों आय कै, पूंछै बहते पक्ष ।
जेते कारज जगत के, सुफल होयँ यों सब ॥
बहते स्वर से आय करि, जो पूंछै सुन और ।
जेते कारज जगत के, उलटे हों विधि क्रोर ॥
कै बायें कै दाहिने, जो कोइ पूरण होय ।
पूंछै पूरण होरही, कारज पूरण सोय ॥

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । '११५
बरस एक को फल कहै, तत मत जानै सोय ।
काल समौ सोई लखै, बुरो भलो जग होय ॥
संक्रायत पुनि मेष विचारै । तादिन लगै सु घड़ी निहारै ॥
तबहीं स्वर में करै विचारा । चलै कौन सो तत्त्व नियारा ॥
जो बायें स्वर पिरथी होई । नीको तत्त्व कहावै सोई ॥
देश वृद्धि अरु समै बतावै । परजा सुखी मेह बरसावै ॥
चारा बहुत ढोर को उपजै । नरदेही कों अन्न बहु निपजै ॥
जल चालै बायें स्वर माहीं । धरती फलै मेह बरसाहीं ॥
आनँद मंगल सों जग रहै । आपतत्त्व चन्दामें बहै ॥
जल धरती दोनों शुभ भाई । चरणदास शुकदेव बताई ॥
तीन तत्त्वका कहौं विचारा । स्वर में जाको भेद निहारा ॥
लगै मेष संक्रायत तबहीं । लगती घड़ी विचारै जबहीं ॥
अग्नितत्त्व स्वरमें जब चालै । रोग दोषमें परजा हालै ॥
काल पड़ै थोड़ोसो बरसै । देश भंग जो पावक दरसै ॥
वायु तत्त्व चालै स्वर संगा । जग भयमान होय कछु दंगा ॥
अर्द्ध काल थोड़ो सो बरसे । वायु तत्त्व जो स्वरमें दरसे ॥
तत्त्व आकाश स्वर चालै दोई । मेह न बरसै अन्न न होई ॥
काल पड़ै तृण¹ उपजै नाहीं । तत अकाश जोहो स्वर माहीं ॥
दो० चैत महीना मध्य में, जबहीं परिवा होय ।
शुक्लपक्ष ता दिन लगै, प्रातस्वास² में जोय ॥
भोरहि परिवा को लखै, पृथ्वी होय सुथांन ।
होय समौ परजा सुखी, राजा सुखी निदान ॥
नीर चलै जो चन्द में, यही समै की जीत ।
मेह बरसै परजा सुखी, संबत नीको मीत ॥
१ घास २ पहिला श्वासा ॥