भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्वरोदयवर्णन । ११७
भोजन करै करै असनाना । मैथुन कर्म्म ध्यान परधाना ॥
वही लिखै कीजै व्यवहारा । गज घोड़ा वाहन हथियारा ॥
विद्या पढ़ै नई जो साधै । मंतर सिद्धि ध्यान आराधै ॥
वैरीभवन गवन जो कीजै । अरु काहूको ऋण जो दीजै ॥
ऋण काहूपै जो तू मांगै । विष अरु भूत उतारन लागै ॥
चरणदास शुकदेव विचारी । ये चरकर्म्म भानु की नारी ॥
दो० चरकारज को भानु है, थिरकारज को चन्द ।
सुषमन चलत न चालिये, तहां होय कछु दन्द ॥
गाँव परगने खेत पुनि, ईधर ऊधर भीत ।
सुषमन चलत न चालिये, बरजत है रणजीत ॥
क्षण बायें क्षण दाहिने, सोई सुषमन जानि ।
ढील लगै कै ना मिलै, कै कारज की हानि ॥
होय क्लेश पीड़ा कछू, जो कोई कहिं जाय ।
सुषमन चलत न चालिये, दीन्हों तोहिं बताय ॥
जोग करौ सुषमन चलै, कै आतम को ध्यान ।
और काज कोई करै, तौ कुछ आवै हान ॥
पूरव उत्तर मत चलै, बायें स्वर परकाश ।
हानि होय बहुरै नहीं, आवनकी नहिं आश ॥
दहिने चलत न चालिये, दक्षिण पश्चिम जानि ।
जोर जाय बहुरै नहीं, तहां होय कछु हानि ॥
दहिने स्वर में जाइये, पूरव उत्तर राज ।
सुख संपति आनँद करै, सभी होय शुभकाज ॥
बायें स्वर में जाइये, दक्षिण पश्चिम देश ।
सुख आनँद मंगल करै, जोर जाइ परदेश ॥
१ धन ॥