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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 690 में से

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पृष्ठ 151

११६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पृथ्वी पानी समौ जो, बहै चन्द अस्थान ।
'दहिने स्वर में जो बहै, समौ सु मध्यम जान ॥
भोरहिजो सुषमन चलै, राज होय उतपात ।
देखनवारो विनशहै, और काल पड़िजात ॥
राजहोय उतपात पुनि, पड़ै काल विसवास ।
मेह नहीं परजा दुखी, जो हो तत्त्व अकास ॥
श्वासा में पावक चलै, परै काल जब जान ।
रोग होय परजा दुखी, घटै राज को मान ॥
भय कलेश हो देश में, विग्रह फैलै अत्त ।
परै काल परजा दुखी, चलै वायु को तत्त ॥
संक्रायत अरु चैत को, दीन्हों भेद लखाय ।
जगतकाज अबकहतहूं, चन्द सूरको न्याय ॥
विवाहदान तीरथ जो करै । वस्तर भूषण घर पग धरै ॥
बायें स्वर में ये सब कीजै । पोथी पुस्तक जो लिखि लीजै ॥
'जोगाभ्यासरु कीजै प्रीत । औषधि बाड़ी कीजै मीत ॥
दिक्षा¹ मंतर बोवै नाज । चन्द्र जोग थिर बैठै राज ॥
चन्द्र जोग में स्थिर जानौ । थिर कारज सबही पहिंचानौ ॥
करै हवेली छप्पर छावै । बाग बगीचा गुफा² बनावै ॥
हाकिम जाय कोट में बरै । चन्द्र जोग आसन पग धरै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । चन्द्र जोग थिर काज कहावै ॥
दो० बायें स्वर के काज ये, सो मैं दिये बताय ।
दहिने स्वरके कहत हूं, ज्ञानस्वरोदय गाय ॥
जो खांड़ो कर लीयो चाहै । जाकर वैरी ऊपर बाहै ॥
युद्ध वाद रण जीतै सोई । दहिने स्वर में चालै कोई ॥
१ गुरुसे मंत्र लेना २ कन्दरा ॥