भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२७
षट सहस्र जपि जापले, ब्रह्म सावि¹त्री नाल ॥
दशम पंखरी कमल है, नील वरण सो नाम ।
विष्णुलक्षिमी वासकिनो, षट सहस्र पर जाप ॥
अनहृद चक्र हृदय रहै, द्वादश दलऔर श्वेतं ।
षट सहस्र जपि जापले, शिव शक्ती जहाँ हेत ॥
षोड़शदल को कमल है, कण्ठ वास शशि रूप ।
जाप सहस्र जहाँ जपै, भेद लहै अति गूप ॥
अग्नि चक्र दो दलकमल, त्रिकुटी धाम अनूप ।
जाप सहस्र जहां जपै, पावै ज्योति स्वरूप ॥
दल हजार को कमल है, गगन मण्डल में वास ।
जाप सहस्र जहां जपै, तेज पुंज परकास ॥
जोग जुक्तिकरि खोजिले, सुरत निरत करचीन ।
दश प्रकार अनहद बजै, होय जहाँ लवलीन ॥
कुं० एक भंवर गुंजारसी दूजे घुंघुरू होय ।
तीजे शब्द जु शंखका चौथे घण्टा सोय ॥
चौथे घण्टा सोय पाँचवें, ताल जु बाजै ।
छठे सुमुरली नाद सातवें भेरि जु गाजै ॥
अठवें शब्द मृदंग का नाद नफीरी नोय ।
दसवें गरजनि सिंहसी चरणदास सुनि लोय ॥
दो० दश प्रकार अनहद घुरै, तजत जोगी होय लीन ।
इन्द्री थकि मनुआँ थकै, चरणदास कहि दीन ॥
'तीन बन्ध नौनाटिकाँ२, दशवाईं को जान ।
प्राण अपान समान है, और कहिदेत उदान ॥
'व्यानवायुऔरकिरकिरा, कूरम बाई जीत ।
१ शारदा २ नाड़ी ॥