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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 690 में से

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पृष्ठ 161

१२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुदा लिंग मुख तीसरो, हाथ पाँव लखि लेह ।
पांचौ इन्द्री कर्म हैं, यह भी कहिये देह ॥
पृथ्वी काल जो ठौर है, मुखै जानिये द्वार ।
पीलो रंग पहिंचानिये, पीवन खान अहार ॥
पित्ते में पावक रहै, नैन जानिये द्वार ।
लालरंग है अग्नि को, मोह लोभ आहार ॥
जल को बासा भाल है, लिंग जानिये द्वार ।
मैथुन कर्म अहार है, धौलो रंग निहार ॥
पवन नाभि में रहत है, नासा जानि दुआर ।
हरो रंग है वायु को, गन्ध सुगन्ध अहार ॥
अकाश शीश में वास है, श्रवण दुआरो जान ।
शब्द कुशब्द अहार है, ताको श्याम पिछान ॥
कारण सूक्ष्म लिंग है, अरु कहियत अस्थूल ।
शरीर तीन सों जानिये, मैं मेरी जड़ मूल ॥
चितबुद्धि मन अहंकार जो, अन्तःकरण सुधार ।
ज्ञान अग्नि सों जारिये, करिकरि मीत विचार ॥
शब्द सपरसरु गन्ध है, अरु कहियत रस रूप ।
देह कर्म्म तनमात्रा, तू कहियत निहरूप ॥
निराकार अद्वै अचल, निर्बासी तू जीव ।
निरालम्ब निर्वैर सो, अज अविनाशी सीव ॥
वावों कोठा अग्नि को, दहिने जल परकास ।
मन हिरदय अस्थान है, पवन नाभि में वास ॥
मूल कमल दल चारको, लाल पॅखरी रङ्ग ।
गौरीसुत वासो कियो, छह्यै जाप इकङ्ग ॥
पटदल कमल पियरे वरण, नाभी तले संभाल ।